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सज गया शिव बाड़ी

Sat, 23 Apr 2016 12:00 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला/ऊना
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शिवबाड़ी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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शिव बाड़ी यानी शिव का वास स्थान। गगरेट स्थित प्राचीन द्रोण शिव मंदिर में शनिवार को भगवान शिव विराजमान होंगे और भक्तों को दर्शन देंगे। कहते हैं कि यह स्थल महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी थी। यहां भगवान शिव का प्राचीन एवं भव्य मंदिर है।
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धारणा है कि इसका निर्माण स्वयं शिवजी ने किया था। कहते हैं कि गुरु द्रोणाचार्य हर रोज स्नान इत्यादि कर शिव आराधना के लिए कैलाश पर जाया करते थे। गुरु द्रोण की पुत्री ययाति अपने पिता से हठ करने लगी कि आप हर रोज कहां जाते हैं, मैं भी आपके साथ चलूंगी। गुरु द्रोणाचार्य ने कन्या को बहुत समझाया, लेकिन जब ययाति नहीं मानी तो कहा कि तुम्हें अवश्य अपने साथ ले चलूंगा, लेकिन तुम पहले घर में ही शिवजी का बीज ओम नम: शिवाय का जाप करो। गुरु द्रोण की बेटी एकाग्रचित होकर दृढ़ विश्वास से घर में ही नित्य पाठ करने लगी। कुछ दिन बीतने पर शिवजी गुरु द्रोण की बेटी की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं शिव बाड़ी पहुंच कर उससे बाल लीला कर खेलने लगे। कुछ दिनों बाद ययाति ने अपने पिता से कहा कि आपके जाने के बाद यहां पर जटाधारी बालक आता है और खेल कर चला जाता है। द्रोणाचार्य कहने लगे मैं भी उस जटाधारी बालक को देखूंगा। अगले ही दिन घर से थोड़ी ही दूर जाने के बाद वह रास्ते से वापस आए और घर पहुंचकर आश्चर्यचकित रह गए। जब उन्होंने देखा कि एक बालक रूप उनकी बेटी के साथ खेल रहे हैं। गुरु द्रोणाचार्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से बालक रूप में आए भगवान शिव को पहचान लिया।
ययाति ने हठ पूर्वक कहा कि हम आपको यहां से अब कभी जाने नहीं देंगे। शिव भगवान को उनका कहना मानना पड़ा और उन्होंने कहा कि वैसे तो मेरा वास हिमालय में है, लेकिन ययाति का बाल हठ एवं श्रद्धा देख भगवान शिव ज्योति रूप में अंतर्ध्यान हो कर वहां स्थापित शिव पिंडी में विलीन हो गए तथा कहा कि हर वर्ष वह बैसाखी से दूसरे शनिवार के दिन शिवबाड़ी परिसर में किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित हुआ करेंगे। शिवबाड़ी के मुख्य पुजारी अजय शर्मा और अश्वनी शर्मा ने बताया कि मेले की सभी तैयारियां पूर्ण हो चुकी हैं।
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दक्षिण महारुद्र के रूप में भी पहचान
एक अन्य आध्यात्मिक पहलू यह भी है कि माता चिंतपूर्णी की चारों दिशाओं में चार महारुद्र हैं और शिव बाड़ी स्थित यह शिव मंदिर माता चिंतपूर्णी का दक्षिण महारुद्र है। शिव बाड़ी स्थल की चारों दिशाओं में चार कोनों पर चार श्मशानघाट तथा उनके साथ चार कुएं भी हैं।

इनसेट
डाल-डाल, पात-पात पर मुर्दों का हक
समस्त शिवबाड़ी क्षेत्र विभिन्न पेड़ों से घिरा एक जंगल है। इस जंगल की लकड़ी को केवल मुर्दा जलाने के लिए ही प्रयोग में लाया जाता है। अनंत काल से यही परंपरा निभाई जा रही है। इसके अलावा यह लकड़ी साधु-महात्माओं का धूना जलाने तथा यहां के यज्ञ भंडारों में जलाने के काम आती है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब मुगल सम्राट औरंगजेब अपनी सेना को लेकर इस शिव मंदिर को तोड़ने पहुंचा तो जैसे ही उसकी सेना ने पवित्र पिंडी को हाथ लगाया, पिंडी नीचे होती चली गई। मुगल सम्राट ने हुक्म दिया कि इस पिंडी को उखाड़ फेंको। जैसे ही उसके सैनिकों ने पिंडी पर प्रहार करना शुरू किया, वैसे ही लाल रंग के जहरीले जानवरों ने उन पर हमला कर दिया। देखते ही देखते मुगल सम्राट के समस्त सैनिक बेहोश होकर गिर गए। तब सम्राट ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान शंकर से क्षमा याचना की और कुछ बुजुर्गों ने जलैहरी का जल लेकर सब सैनिकों को छींटे दिए। भगवान शंकर की स्तुति के बाद सभी सैनिक धीरे-धीरे होश में आ गए। आज भी यह पवित्र पिंडी जमीन के अंदर धंसी हुई स्थिति में विराजमान है।
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