नारी (ऊना)। रासायनिक खेती के बढ़ते चलन के बीच बदोली की निर्मला देवी ने जैविक खेती से मोटे अनाज (मिलेट्स) उगाकर नई राह दिखाई है। मोटे अनाज की खेती से उन्होंने न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया बल्कि क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में भी प्रेरित किया।
राष्ट्रीय आजीविका मिशन प्राधिकरण के तहत स्वयं सहायता समूहों को दिए जा रहे प्रशिक्षण का लाभ उठाते हुए निर्मला देवी सहित 10 महिलाओं का समूह जैविक तरीके से मोटे अनाज (मिलेट्स) का उत्पादन कर रहा है। इस पहल से महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं और समाज में एक सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिल रहा है।
निर्मला देवी ने बताया कि वह चार वर्षों से जैविक ढंग से बाजरा, ज्वार, रागी, चना, कंगनी, मंडल, सफेद और काला गेहूं जैसी फसलों का उत्पादन कर रही हैं। इन अनाजों में फाइबर, प्रोटीन, आयरन और कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जिससे स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार होता है।
उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर पर इन अनाजों की मांग इतनी अधिक है कि आपूर्ति पूरी नहीं हो पा रही। इससे समूह की आय भी बढ़ी है और हर सदस्य को प्रति माह लगभग 10 से 12 हजार रुपये तक की आमदनी हो रही।
निर्मला देवी की यह सफलता बताती है कि जैविक खेती और मिलेट्स न केवल किसानों की आय बढ़ा सकते हैं बल्कि लोगों को बेहतर स्वास्थ्य भी दे सकते हैं। यह मॉडल ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम है।
इन बीमारियों में मोटे अनाज से राहत
आयुर्वेदिक चिकित्सक अरुण कुमार के अनुसार मोटे अनाजों का नियमित सेवन शुगर (डायबिटीज), खून की कमी, मोटापा और पाचन संबंधी समस्याओं में काफी लाभकारी है। ये अनाज हड्डियों को मजबूत करने में भी सहायक हैं और इन्हें रोटी, दलिया, इडली और डोसा जैसे विभिन्न रूपों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
महिलाओं में बढ़ रही रुचि
समूह की मुख्य प्रशिक्षक मीना कुमारी ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद अब अधिक महिलाएं इस दिशा में आगे आ रही हैं। महिलाएं न केवल जैविक खेती अपना रही हैं बल्कि अपने परिवारों के स्वास्थ्य में भी सुधार ला रही हैं।
केस स्टडी
गांव की वर्षीय केसरी देवी ने बताया कि छह महीने तक मोटे अनाज की रोटी खाने से उनका मधुमेह स्तर सामान्य हो गया है। दो महीनों से उन्होंने दवा लेना भी बंद कर दिया है।
गांव के 60 वर्षीय राजेंद्र कुमार ने बताया कि तीन महीने से मोटे अनाज का सेवन करने से उन्हें गैस्ट्रिक और शरीर में सुस्ती की की समस्या से 80 प्रतिशत राहत मिली है और अब वह किसी प्रकार की दवा नहीं ले रहे।