संवाद न्यूज एजेंसी
घनारी (ऊना)। प्रदेश सरकार द्वारा पूरे प्रदेश में चालू वित्त वर्ष के शुरू यानी एक अप्रैल 2024 से पूरे प्रदेश में स्टांप पेपर की बजाय ई स्टांप प्रणाली को शुरू किया गया था, जिसका एकमात्र उद्देश्य स्टांप पेपर, उसकी छपाई तथा इन पेपरों के ऊपर सरकार के हो रहे भारी भरकम खर्चे को बचाना था।
इस प्रणाली के माध्यम से करीब 50 करोड़ रुपये प्रति वर्ष बचाने का दावा भी प्रदेश सरकार द्वारा किया गया था, इसके साथ ही दावा यह भी किया गया था कि उपभोक्ताओं को लाभान्वित करने के लिए केंद्रीय रिकॉर्ड रखने वाली एजेंसी द स्टॉक होल्डिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के पोर्टल पर ई स्टांप तैयार किए जा सकेंगे, जो कि हर समय उपभोक्ताओं के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध रहेंगे और स्टांप विक्रेताओं को न्यूनतम कमीशन अदा कर इस पोर्टल के माध्यम से ई स्टांप तैयार करने के लिए अधिकृत किया जाएगा। प्रदेश में जब मैनुअल स्टांप पेपर बिका करते थे, तब प्रति विक्रेता स्टांप पेपर के विक्रय की अधिकतम सीमा बीस हज़ार रुपए थी, परन्तु ई स्टांप प्रणाली अपनाने से इस सीमा को बढ़ाकर 2 लाख रुपए प्रतिदिन कर दिया गया था। सरकार का दावा तो उपभोक्ताओं को लाभान्वित करना था, लेकिन इस प्रणाली के लागू होने के बाद उनसे विक्रेता अधिक वसूली कर रहे हैं, जिससे लोग ठगा सा महसूस कर रहे हैं। घनारी तहसील कार्यालय के बाहर कुछ ई स्टांप खरीदारों ने शिकायत की कि ई स्टांप विक्रेता प्रति ई स्टांप दस रुपए अधिक वसूल रहे हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए विक्रेता रविंदर सिंह ने बताया कि मैनुअल स्टांप पेपर के समय उनका कमीशन चार प्रतिशत हुआ करता था, जिसे बेचने के लिए उन्हें अन्य किसी भी किस्म का भी खर्चा नहीं करना पड़ता था, लेकिन प्रदेश में ई स्टांप प्रणाली शुरू करने के बाद उनका कमीशन घटाकर मात्र जीरो प्वाइंट पच्चासी प्रतिशत कर दिया गया है। जबकि ई स्टांप पेपर छापने को लेकर उन्हें इंटरनेट, प्रिंटर और पेपर सहित कई तरह के अन्य खर्च भी आते हैं। रविंदर सिंह ने बताया कि इस विषय पर उनकी राज्य स्तरीय यूनियन ने माननीय उच्च न्यायालय शिमला में याचिका भी दायर की हुई है। उधर, जिलाधीश ऊना जतिन लाल ने बताया कि इस संदर्भ में कोई स्पष्ट गाइडलाइंस नहीं हैं, लेकिन अंकित मूल्य से ज्यादा नहीं वसूला जा सकता। मामले की जांच की जाएगी।