दुलैहड़ (ऊना)। आठ साल से अलग रह रहे दंपती का विवाह ऊना परिवार न्यायालय ने आपसी सहमति से समाप्त करने का फैसला सुनाया है। दोनों के बीच वैवाहिक संबंधों में सुधार की संभावना नहीं रहने और साथ रहने की इच्छा नहीं जताने पर अदालत ने तलाक की याचिका मंजूर कर ली। विवाह से जन्मी दोनों बेटियां पिता के पास रहेंगी। वहीं, पत्नी ने भविष्य में पति से भरण-पोषण या गुजारा भत्ता नहीं लेने पर सहमति जताई है। अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश-प्रथम, परिवार न्यायालय ऊना राजिंदर कुमार की अदालत ने नौ अक्तूबर को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत यह आदेश पारित किया।
अदालत में पेश संयुक्त याचिका के अनुसार, दोनों का विवाह 17 मई 2014 को ऊना जिले के छत्तारा गांव में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। शादी के बाद दोनों मावा सिंधियां गांव में पति-पत्नी के रूप में रहने लगे। इस विवाह से दो बेटियां पैदा हुईं, जिनकी उम्र 12 और 11 वर्ष है। कुछ समय बाद पति-पत्नी और उनके परिजनों के बीच मतभेद पैदा हो गए। इससे वैवाहिक संबंध तनावपूर्ण हो गए और दोनों के बीच आपसी सामंजस्य नहीं बन पाया। दोनों 17 मई 2018 से अलग रह रहे थे। लंबे समय तक अलग रहने के बाद दोनों ने माना कि उनके बीच संबंध सामान्य होने और दोबारा साथ रहने की संभावना नहीं है। इसके बाद उन्होंने आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने के लिए अदालत में संयुक्त याचिका दायर की। याचिका और अदालत में दर्ज बयानों के अनुसार, दोनों बेटियां फिलहाल पिता के साथ रह रही हैं और भविष्य में भी उनके साथ ही रहेंगी। दोनों पक्षों ने गुजारा भत्ता और अन्य आर्थिक दावों को लेकर आपसी सहमति होने की बात कही। पत्नी ने स्पष्ट किया कि वह भविष्य में पति से किसी तरह का भरण-पोषण या गुजारा भत्ता नहीं मांगेगी। साथ ही, पति के खिलाफ यदि कोई मामला दर्ज कराया गया है तो उसे वापस लेने पर भी सहमति जताई। दोनों पक्षों के पहले चरण के बयान नौ सितंबर 2026 को दर्ज किए गए थे। इसके बाद पति की ओर से छह महीने की कूलिंग ऑफ अवधि में छूट देने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया। अदालत ने छह अक्तूबर को इस आवेदन को स्वीकार कर लिया और उसी दिन दोनों पक्षों के दूसरे चरण के बयान भी दर्ज किए गए। अदालत ने दोनों पक्षों के बयानों पर विचार करने के साथ उनके अलग-अलग रहने की स्थिति और वैवाहिक संबंधों में सुधार की संभावना को भी परखा। न्यायालय ने पाया कि दोनों अपनी इच्छा से विवाह समाप्त करना चाहते हैं और उन पर किसी तरह का दबाव या प्रभाव नहीं है। अदालत ने यह भी पाया कि दोनों के बीच सुलह की संभावना नहीं बची है। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने नौ अक्तूबर को तलाक की याचिका मंजूर कर विवाह को आपसी सहमति से समाप्त करने की डिक्री पारित कर दी। अदालत ने दोनों पक्षों को उनके दर्ज बयानों के लिए बाध्य माना।