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कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मैड़ी पहुंचते हैं विभिन राज्यों के श्रद्धालु

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मैड़ी स्थित चरणगंगा में स्नान करते हुए श्रद्धालु। संवाद - फोटो : Una
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अंब(ऊना)। मानसिक परेशानी हो या फिर कोई प्रेत बाधा। मान्यता है कि यहां शीश झुकाने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। मुरादें पूरी करने वाले व दुखों को हरने वाला बाबा बड़भाग सिंह मैड़ी होली मेला हर आने वाले श्रद्धालु की आस्था का केंद्र है। इसके साथ ही यहां विशेष रूप से ऐसे लोग भी अपने कष्टों से मुक्ति पाने के लिए आते हैं, जिन्हें जादू-टोना अथवा कोई प्रेत बाधा की शिकायत है। इसका इतिहास जुड़ा है बाबा बड़भाग सिंह सोढ़ी जी के साथ।
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मैदानी जिला ऊना के साथ पहाड़ों के बीच बसे मैड़ी गांव में बाबा बड़भाग सिंह की तपोस्थली है। सोढ़ी वंश के बाबा बड़भाग सिंह जी के पिता का नाम राम सिंह था। कहा जाता है कि अहमद शाह अब्दाली के हमलों से बचते हुए बाबा बड़भाग सिंह करतारपुर पंजाब से मैड़ी आ गए थे। मैड़ी आने के बाद बाबा जी एक स्थान पर तपस्या में लीन हो गए। यह क्षेत्र उस वक्त एक राक्षस नाहर सिंह के आतंक से ग्रसित था। उसका निवास एक बेरी के पेड़ पर बताया जाता था।
बाबा जी से सामना होने पर उन्होंने अपने तपोबल से उस राक्षस को एक पिंजरे में कैद कर लिया। जिस पर उस राक्षस ने बाबा जी से क्षमा मांगी और छोड़ देने का आग्रह किया। जिस पर बाबा जी ने नाहर सिंह वीर से वचन लिया कि वह लोगों को सताएगा नहीं और जो लोग यहां श्रद्धा के साथ आएंगे, वह उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण करेगा।
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ऐसे हुई मैड़ी होली मेले की शुरूआत
किंवदंती है कि बाबा जी अपनी तप की शक्तियों से अपने शरीर को धरती पर छोड़ कर, आत्मा को विचरण के लिए भेज देते थे। एक बार बाबा जी की आत्मा शरीर छोड़ कर गई हुई थी। जिस पर लोगों ने उन्हें मृत समझ लिया और उनकी देह का संस्कार कर दिया। जब बाबा जी की आत्मा वापस आई तो पाया कि उनकी देह जल चुकी थी। इसके बाद बाबा जी उनकी पत्नी को ही दिखाई देते थे। उनके आने की शर्त यह थी कि ताजा लीपा हुआ गोबर पूरा सूखने के बाद उनकी आत्मा वापस चली जाएगी। एक दिन पत्नी ने मोह वश गोबर में कुछ ऐसा पदार्थ मिला दिया कि गोबर जल्द न सूखे। जिसका पता चलने पर बाबा जी नाराज हो गए और हमेशा के लिए वहां से जाने लगे। तब अपनी गलती का अहसास होने पर पत्नी ने उनसे माफी मांगी। जिस पर बाबा जी ने कहा कि अब वह होली के दिन मैड़ी में साक्षात मौजूद रहेंगे और संगतों को आशीर्वाद देंगे। जिसके बाद से ही मैड़ी में होली मेले का आगाज हुआ।
प्रसाद में दिखते हैं पंजे के निशान
मैड़ी के विभिन्न धार्मिक स्थलों में होली से पूर्व एक बंद कमरे में देसी घी से विशेष रूप से बनाए गए प्रसाद को ढककर रख दिया जाता है। कहा जाता है कि अपनी उपस्थिति को दर्शाने के लिए बाबा जी उस प्रसाद पर अपने हाथ का निशान बनाते हैं। जिसे पंजे का प्रसाद कहा जाता है। इसे संगतों में बांटा जाता है।
ये धार्मिक स्थल हैं आस्था के केंद्र
मैड़ी में डेरा बाबा बड़भाग सिंह जी, बेरी साहिब, बाबा जी की तपोस्थली गुरुद्वारा मंजी साहिब, कुज्जासर, चरणगंगा और मंदिर वीर नाहर सिंह जी जैसे धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। बेरी साहिब में बाबा जी की समाधि और बेरी का पेड़ है। गुरुद्वारा मंजी साहिब वह स्थान है जहां बाबा जी ने अपनी तपस्या की थी। कुज्जासर के बारे में प्रख्यात है कि वहां बाबा जी ने नेजा (भाला) मारकर जमीन से पानी निकाला था और वहां अपना नितनेम करते थे। चरणगंगा के बारे में कहा जाता है कि वहां के जल से स्नान करने से बुरी आत्माओं से छुटकारा मिलता है और धूने पर माथा टेकने से मुरादें पूर्ण होती हैं। मंदिर वीर नाहर सिंह जी में लोग दुखों से छुटकारे की दुआएं मांगते हैं।
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