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कच्चे माल का आयात प्रभावित होने से सूबे में खाद संकट

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ऊना। कोरोना से कच्चे माल का आयात प्रभावित होने से सूबे में खाद संकट पैदा हो गया है। गेहूं बिजाई की तैयारियों में जुटे किसानों को एनपीके 12-32-16 खाद न मिलने से संकट का सामना करना पड़ रहा है। इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर को-ऑपरेटिव लिमिटेड (इफको) का कहना है कि खाद बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कमी के कारण सूबे में यह संकट पैदा हुआ है।
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12-32-16 को बनाने में इस्तेमाल होने वाले पोटाश 100 फीसदी और फास्फोरिक एसिड 79 फीसदी विदेश से आयात होता है। कोरोना काल में यह आयात प्रभावित हुआ है। बिजाई के लिए 12-32-16 खाद उपयुक्त मानी जाती है। यह खाद पिछले दो महीने से सरकारी गोदामों से गायब है। नवंबर महीना शुरू होते ही गेहूं की बिजाई का काम शुरू हो चुका है और इसके साथ ही 12-32-16 की मांग बढ़ गई। कृषि विभाग और सहकारी सभा डिपुओं में गोदाम खाली हैं। कुछ जगह एनपीके 15-15-15 खाद की बिक्री से खानापूर्ति की जा रही है लेकिन यह स्टॉक भी खत्म होने को है। किसानों कीमती लाल, सुरेश कुमार, राजकुमार, बुट्टा सिंह, अवतार सिंह, श्रीराम, निक्का राम का कहना है कि खाद के लिए वह दूरदराज के सहकारी डिपुओं और कृषि विभाग के गोदामों के चक्कर काट रहे हैं। अंब क्षेत्र के नजदीक पड़ते गांव अंदोरा के तीन किसान खाद लेने के लिए 20 किलोमीटर दूर पंडोगा गांव पहुंचे, जहां भी उन्हें 12-32-16 नहीं मिल पाई और 15-15-15 की तीन बोरियां लेकर लौटना पड़ा।
उन्होंने बताया कि उनके आसपास के गांवों में तो 15-15-15 खाद भी उपलब्ध नहीं है। उधर इफको को एरिया प्रबंधक भुवनेश पठानिया ने बताया कि खाद की कमी पेश आ रही है। इसकी वजह खाद के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पोटाश और फास्फोरिक एसिड का निर्यात में कमी आना है। पोटाश और फास्फोरिक एसिड से ही 12-32-16 का निर्माण होता है। पोटाश की मदद से ही डीएपी को 12-32-16 खाद में बदला जाता है। इसका आयात चीन समेत कई देशों से होता है। कोरोना काल में यह प्रक्रिया प्रभावित रही है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि जल्द जिले के अलग-अलग हिस्सों में खाद की आपूर्ति हो जाएगी।
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राज्य में हर साल एक लाख टन से अधिक खाद की मांग
राज्य में हर साल एक लाख दस हजार टन तक खाद की खपत होती है। इसमें 70 से 75 हजार टन तक यूरिया और 25 से 30 हजार टन 12-32-16 का इस्तेमाल होता है। ऊना जिले की बात करें तो यहां हर साल 4500 टन 12-32-16 और 12 हजार 500 टन यूरिया का इस्तेमाल किया जाता है।
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