पड़ताल - 2 मवेशी सड़क पर
व्यर्थ साबित हो रही साल 2019 से जारी पशुओं की टैगिंग प्रक्रिया
लावारिस पशु छोड़ने का जिसे में कोई केस दर्ज नहीं
पंचायत प्रतिनिधियों ने कहा, बड़े अधिकारियों के पास हो कार्रवाई की शक्ति
संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। जिले में मवेशियों के कान में मालिकों के नाम और फोन नंबर अंकित टैग काटकर सड़कों पर खुले में छोड़ा जा रहा है। इससे रोजाना हादसे हो रहे हैं। कीमती जानें जा रही हैं। साल में करीब 50 लोग मवेशियों से टकराने के चलते जान गंवा रहे हैं। मवेशी किसानों की फसल भी बर्बाद कर रहे हैं। यह समस्या करीब डेढ़ दशक पुरानी है। इसकी रोकथाम के लिए साल 2019 में पशुपालन विभाग ने पशुओं के कान में टैग लगाने की प्रक्रिया शुरू की। इस टैग में अंकित नंबरों से पशुओं के मालिकों की पहचान हो सकती है। यह प्रक्रिया वर्तमान तक जारी है। इसके बावजूद धरातल पर लावारिस पशुओं विशेषकर गोवंश की संख्या लगातार बढ़ रही है। वहीं, विभाग की टैगिंग प्रक्रिया भी व्यर्थ साबित हो रही है। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक करीब 1.20 लाख पशुओं को टैग लगाए गए हैं। सड़कों पर घूमने वाले पशुओं में अधिकतर के कान में विभाग की ओर से लगाया गया प्लास्टिक टैग नहीं है। उनके कानों पर लगा टैग काट दिया गया है या निर्दयता से उतना कान ही काट दिया गया, जहां टैग लगा था। जिन पशुओं के कानों में टैग मिलता है उन्हें पंचायत प्रतिनिधियों ने उनके मालिकों तक पहुंचाया लेकिन उसके आगे कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हो पाता। अगर जुर्माने की बात करें तो अधिकतम 1000 रुपये तक का प्रावधान है। लोग पशु वापस लेने के बजाय जुर्माना भरना बेहतर समझते हैं। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि कार्रवाई की शक्तियां जिले के बड़े अधिकारियों के पास होनी चाहिए। पंचायत प्रतिनिधियों का लोगों में कोई भय नहीं होता। स्थिति यह है कि सड़कों पर तो गोवंश की भरमार है लेकिन उन्हें छोड़ने वालों के खिलाफ एक भी केस दर्ज नहीं।
सबसे पहले तो लावारिस पशुओं की पहचान करना ही मुश्किल हो जाता है। लोग पशुओं का कान से या टैग उखाड़ देते हैं या कान ही काट देते हैं। पहचान में आने वाले पशुओं को लोगों तक पहुंचाया जाता है। ऐसे कार्य करने वालों पर जुर्माना राशि को बढ़ाना चाहिए। नहीं तो इस स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं आने वाला।
-अंबोटा पंचायत के उपप्रधान जॉनी ठाकुर
गोवंश के लिए कई वर्ष कार्य किया। पहचान में आए पशुओं को गाड़ी के जरिये उनके मालिकों तक भी पहुंचाया। कहा कि पंचायत से स्थानीय लोग भय नहीं खाते। जुर्माने से अधिक कुछ कर नहीं सकते। यह अधिकार बड़े अधिकारी के पास होना चाहिए।
-नंगल जरियाला ग्राम पंचायत के उपप्रधान शौर्य चक्र विजेता कैप्टन सुशील जरियाल
लावारिस पशुओं की समस्या खत्म करने के लिए नए सिरे से रणनीति बननी चाहिए। ये लोगों की मौत का कारण बन रहे हैं। जिला उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक को इस समस्या से निपटने के लिए अभियान चलाना चाहिए। यह पंचायतों के बस की बात नहीं। -ग्राम पंचायत दियोली के प्रधान पूर्ण सिंह
उधर, पशुपालन विभाग के उपनिदेशक विनय शर्मा ने बताया कि जिले में कुल 1.23 लाख पशु पंजीकृत हैं। उनमें से 1.20 लाख पशुओं को टैग लगाए गए हैं। देखने में आया है कि लोग टैग को तेजधार वस्तुओं से काट रहे हैं। इससे पशुओं की पहचान नहीं हो पाती। कहा कि मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में है। अगर कोई नए निर्देश आएंगे तो तुरंत लागू किए जाएंगे।
पुलिस अधीक्षक राकेश सिंह ने बताया कि इस समस्या का समाधान स्थानीय लोगों के सहयोग के बगैर संभव नहीं। लोग अपने क्षेत्र से पशु वाहनों में लोड कर रात के अंधेरे में दूसरी जगह छोड़ आते हैं। पुलिस टीम को पता चले तो ऐसे वाहनों पर कार्रवाई होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अकेले पशु को गाड़ियों में लाकर छोड़ देते हैं। ऐसे वाहनों पर पुलिस भी शक नहीं कर पाती। जिले में प्रति वर्ष करीब 50 लोग लावारिस पशुओं के साथ हुए हादसे में जान गंवाते हैं। लोगों को इसकी गंभीरता समझनी होगी।