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पलास के पतों में परोसे भोजन में आयुर्वेदिक गुण

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पलास के पत्तों में रखा भोजन। - फोटो : अमर उजाला
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सुबाथू (सोलन)। देवभूमि हिमाचल में सदियों से विभिन्न वनस्पतियों के पतों से बनीं पतलों में परोसा भोजन प्रदेश की संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है लेकिन इसके कई आयुर्वेदिक गुण भी हैं। सेहत के लिए भी पतों में भोजन करना काफी लाभदायक माना जाता है। देवभूमि में किसी भी विवाह में होने वाली धाम सहित धार्मिक और सामाजिक उत्सव में आने वाले अतिथियों को पलाश के पतों की बनीं पतलों में ही भोजन परोसा जाता है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में अब यह संस्कृति देवभूमि हिमाचल से भी विलुप्त होने लगी है। ऐसे में थर्माकोल और प्लास्टिक की पतलों में परोसा भोजन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ रहा है। इससे पर्यावरण के साथ पाचन शक्ति तथा छोटी आंत को भी नुकसान पहुंचता है। वहीं अमलतास की पतलों से लकवाग्रस्त और पीपल के पतों में भोजन करना मंदबुद्धि बच्चों के लिए लाभदायक साबित होता है।
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जिला में आज भी कई परिवारों की जीविका पतलों के माध्यम से चल रही है। लेकिन बाजारों में थर्माकोल और प्लास्टिक की पतलों को बढ़ावा मिलने से अब पतों से बनी पतलों का चलन धीरे-धीरे कम होने लगा है। ग्रामीणों क्षेत्रों में पतलों में भोजन परोसने की परंपरा अभी भी कुछ हद तक बरकरार है। लेकिन शहरों के कार्यक्रम परंपरा को भूलाकर थर्माकोल, प्लास्टिक और चीनी मिट्टी की प्लेटों तक सिमट चुके हैं। भारत के कुछ राज्यों में आज भी केले, पलाश, पीपल सहित विभिन्न वनस्पतियों के पतों में खाना परोसा जाता है। यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

जर्मनी में पतलों का अधिक इस्तेमाल
विदेशों में भी पतों से बनीं पतलों को लोकप्रियता मिल रही है। खासकर जर्मनी में पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिए पतों से बनीं पतलों का चलन तेजी से बढ़ा है। वहां लोग प्लास्टिक और थर्माकोल का इस्तेमाल नहीं कर रहे। पतों की पतलें जल्द मिट्टी में घुल जाती हैं तथा पर्यावरण के लिए भी लाभदायक हैं। भारत में पतलों को बनाने की तकनीक जानने के बाद वहां लोग खुद इसका निर्माण करते हैं।
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प्लास्टिक की प्लेटों घातक : डॉ. कुमार
सुबाथू छावनी के आयुर्वेदिक चिकित्सक सतिंद्र कुमार ने कहा कि पतों की पतलों में भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है। बताया की पलाश की पतल में भोजन करने से खून की खराबी से होने वाली बीमारियों में लाभ मिलता है। अमलतास की पतलों से लकवाग्रस्त और पीपल के पतों में भोजन करना मंदबुद्धि बच्चों के लिए कारगार साबित होता है। इसके विपरीत थर्माकोल और प्लास्टिक की पतलें पर्यावरण के साथ पाचन शक्ति तथा छोटी आंत को भी नुकसान पहुंचाती है। इन पतलों में इस्तेमाल होने वाला केमिकल गर्म खाने के साथ पिघलकर कैंसर जैसी घातक बीमारी को जन्म दे सकता है।

सरकार से मिले बढ़ावा
जिला में आज भी पते की पतलों से अपनी जीविका चला रहे सोहन लाल ने बताया कि पतों की पतलों के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। जंगलों से पते लाने के बाद पूरा दिन में करीब 100 से 200 पतलें तैयार होती हैं। लेकिन बाजार में इनकी मांग भी कुछ खास नहीं है। सरकार पते से बनीं पतलों को बढ़ावा दें तो गांव के लोगों को घर के पास ही रोजगार मिल जाएगा।

मांग पूरी न होने से दिक्कत : गर्ग
सुबाथू में पतलें बेचने वाले आढ़त बाजार के व्यापारी भूमेष गर्ग ने कहा कि आज भी बाजार में पतलों की मांग काफी ज्यादा है। लेकिन समय पर न मिलने के कारण थर्माकॉल और प्लास्टिक की पतलों को बढ़ावा मिल रहा है। मांग पूरी न होने के कारण लोगों का झुकाव प्लास्टिक की बनीं पतलों की तरफ बढ़ रहा है।
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