500 साल बाद उत्तराखंड से गांव रनवा पहुंचे दाईचारे के लोग
हरिपुरधार के रनवा में हुआ उत्तराखंड और हिमाचल की संस्कृति का अनूठा संगम
संवाद न्यूज एजेंसी
हरिपुरधार (सिरमौर)। पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के कुनेन गांव के लोग दिवाली पर्व पर करीब 500 साल बाद सोमवार को अपने बुजुर्गों के पैतृक गांव रनवा पहुंचे, जहां राणा बिरादरी के लोगों का ग्रामीणों ने भव्य स्वागत किया।
इस दौरान रनवा गांव में उत्तराखंड और हिमाचल की अद्भुत संस्कृति के संगम देखने को मिला। दो राज्यों की संस्कृति को देखकर लोग आनंद से भावविभोर हो गए। लोगों ने दोनों राज्यों की संस्कृति का जमकर लुत्फ उठाया।
रनवा गांव पहुंचे नरेंद्र राणा, कृपाल राणा, श्याम सिंह राणा व नारायण सिंह राणा आदि लोगों ने बताया कि करीब 500 वर्षों पहले उनके पूर्वज सिरमौर जिले के हरिपुरधार के समीप रनवा गांव से पलायन करके उत्तराखंड के कुनेन गांव गए थे। जबसे पूर्वज इस गांव को छोड़ कर गए, तब से गांव के किसी भी व्यक्ति का यहां पर आना नहीं हो सका।
रनवा गांव के लोग करीब दो वर्ष पूर्व उनके गांव आए थे। उन्होंने पैतृक गांव आने का निमंत्रण दिया था। वह भी अपने पैतृक गांव आने के लिए काफी उत्सुक थे। इसलिए दिवाली के शुभ अवसर अपने पैतृक गांव गांव आने का फैसला लिया।
कुनेन गांव से आए लोगों ने बताया कि यहां की संस्कृति को देखकर वह काफी आनंदित हुए हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत ही नहीं हुआ कि वह 200 किलोमीटर दूर किसी दूसरे राज्य में आए हैं। उन्हें यहां पहुंचकर भी अपने गांव का एहसास हो रहा है।
....
सिरमौर जौनसार बाबर की संस्कृति एक जैसी
कुनेन (सैंज) गांव निवासी और वर्तमान में चकराता ब्लॉक के चेयरमैन नरेंद्र राणा ने बताया कि सिरमौर और जौनसार बाबर की संस्कृति एक जैसी ही है। वेश भूषा, खान पान भी एक जैसा है।
भाषा में थोड़ा अंतर जरूर है। राणा ने बताया कि रनवा गांव के अलावा हरिपुरधार के समीप ही चंजाहा गांव में भी उनके दाईचारे हैं। सोमवार को उनसे मिलने चंजाहा भी गए थे। उन्होंने बताया कि अप्रैल महीने में उनके गांव कुनेन में एक बड़े धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया जाना है। इस अनुष्ठान के लिए दोनों गांव के लोगों को निमंत्रण दिया है और दोनों गांवों के लोगों को कुनेन बुलाया है।