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सिरमौर के ग्रामीण इलाकों में नाल बड़ियां लगाने का प्रथा कायम
मार्गशीर्ष मास की संक्रांति से शुरू होकर पूरे महीने चलते हैं कार्यक्रम, महिलाएं मिलकर बनाती हैं बड़ियां
आधुनिकता की चकाचौंध में मोबाइल, टीबी मनोरंजन के साधन पड़ रहे भारी
चंद्र ठाकुर
नाहन (सिरमौर)। सिरमौर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोगों ने पारंपरिक रिति-रिवाज और प्रथाओं को संजोकर रखा हुआ है। इनमें एक है नाल बड़ियां (डंडी) लगाने की प्रथा। आधुनिकता की इस चकाचौंध में जहां एक ओर हमारे पारंपरिक रिति-रिवाज और प्रथाएं समाप्त हो रहीं हैं, वहीं कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में यह पारंपरिक प्रथाएं अभी भी सुचारू रूप से चल रहीं हैं।
धारटीधार, सैनधार और पच्छाद क्षेत्र में आज भी नाल बड़ियां लगाई जाती हैं। बुजुर्गों के अनुसार पूर्व में नाल बड़ियां लगाने का यह कार्यक्रम गीत-संगीत के साथ बड़े धूमधाम से मनाया जाता था। आधुनिकता की चकाचौंध में अब इसकी जगह मोबाइल, टीवी और अन्य मनोरंजन के साधनों ने ले ली है। बुजुर्ग कृष्णा देवी, भागवंती देवी, अमरा देवी, कृष्णा देवी बताती है कि यह आयोजन मार्गशीर्ष की संक्रांति से शुरू होता है और पूरे महीने चलता है। पूरे गांव में हर घर में बारी-बारी से इसका आयोजन किया जाता है।
समाज सेवी कुशल चौहान ने बताया कि पहले इस कार्यक्रम का आयोजन बहुत शानदार ढंग से होता था। पूरे गांव को आयोजन के लिए आमंत्रित किया जाता था। शाम के समय गांव की सारी महिलाएं एकत्रित होकर गीत-संगीत के साथ नाल बड़ियां लगाती थीं। इस दौरान पारंपरिक गीत भी गाए जाते थे।
उन्होंने बताया कि दावत के अनुसार लोगों को उबली हुई मक्की शकर के साथ, कोलथी और गेहूं का मूड़ा खाने को दिया जाता था। वर्तमान में मक्की, गेहूं और कोलथी का मूड़ा नहीं बनाया जाता। अब इसके स्थान पर काले चने, खील-पताशे व अन्य सामग्री लोगों में बांटी जाती है। जिस घर में नाल बड़ियां लगाने का कार्यक्रम होता है, वहां पर महिलाओं की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता था। इसमें पारंपरिक गीत, पहाड़ी संस्कृति और स्वांग आदि किए जाते थे। लोग अब रात की बजाए दिन के समय में भी नाल बड़ियां लगा रहे हैं।
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क्या है नाल बड़ियां (डंडी)
उड़द, चना सहित अन्य दालों को पीसा जाता है। फिर इसे आटे की तरह गूंथा जाता है। इसके बाद अरबी के डंडियों में इस गूथें हुए मिश्रण की पुताई की जाती है। इसे एक रस्सी में टांगा जाता है। दूसरे दिन इन्हें छोटे-छोटे दुकड़ों में काटकर सुखाया जाता है। करीब एक सप्ताह तक सुखाने के बाद इसे सुरक्षित रख दिया जाता है। इस तरह से यह एक स्वादिष्ट खाद्य व्यंजन तैयार हो जाता है। खासकर मेहमानों के लिए इस व्यंजन को परोसा जाता है। बुजुर्गों के अनुसार यह एक स्वादिष्ट और गुणकारी खाद्य सामग्री है।
.....संवाद
बढ़ाल गांव में सुखाने के लिए रखी नाल बड़ियां। स्रोत: जागरूक पाठक