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Sirmour News: बेटी को नहीं मिला पिता की पैतृक संपत्ति में हिस्सा, भाइयों के पक्ष दर्ज वसीयत वैध

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जिला जज ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रखा बरकरार, कहा- वृद्धावस्था या अंगूठा लगाने से वसीयत संदेहास्पद नहीं होती
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बेटी ने वसीयत को फर्जी बताते हुए सेशन कोर्ट में दी थी चुनौती

दीपक मेहता

नाहन (सिरमौर)। पैतृक संपत्ति और वसीयत को लेकर करीब नौ साल से चल रहे विवाद में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने अहम फैसला सुनाते हुए एक महिला की दीवानी अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि वर्ष 2016 में दिवंगत पिता की ओर से बेटों के पक्ष में की गई वसीयत को फर्जी, दबाव एवं धोखाधड़ी से तैयार किया गया साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए जा सके। इसके साथ ही अगस्त 2024 में निचली अदालत की ओर से पारित निर्णय और डिक्री को भी बरकरार रखा।
मामला नाहन निवासी निर्मल की ओर से अपने दो भाइयों के खिलाफ दायर मुकदमे से जुड़ा है। अपीलकर्ता का दावा था कि स्वर्गीय भूल सिंह की संपत्ति पैतृक थी और वह सहभाजक होने के नाते उसमें बराबर की हिस्सेदार है। उनका आरोप था कि वर्ष 2016 में उनके पिता से धोखाधड़ी, दबाव और अनुचित प्रभाव के तहत भाइयों के पक्ष में वसीयत तैयार कराई गई। इसी आधार पर उन्होंने वसीयत और उसके आधार पर दर्ज राजस्व प्रविष्टियों को निरस्त करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि वसीयत विधिवत पंजीकृत थी और उसके गवाहों ने न्यायालय में उपस्थित होकर उसके निष्पादन की पुष्टि की।
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अदालत ने फैसले में स्पष्ट कहा कि केवल वृद्धावस्था या हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाने से वसीयत संदेहास्पद नहीं हो जाती। जब तक यह साबित न हो कि वसीयतकर्ता उस समय मानसिक रूप से सक्षम नहीं था। तब तक केवल इस आधार पर वसीयत को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने पैतृक संपत्ति संबंधी दावे पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल किसी संपत्ति को पैतृक बताना पर्याप्त नहीं है। ऐसे दावे को ठोस राजस्व अभिलेखों और विधिक साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध करना आवश्यक होता है। नतीजा अतिरिक्त जिला न्यायाधीश गौरव महाजन ने निर्णय में दीवानी अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को यथावत रखा।
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