एडीजे कोर्ट ने कहा : पर्याप्त साक्ष्य के बिना गैर-कब्जेदार किरायेदार दर्ज करने का आदेश अवैध
पांवटा साहिब के पुरुवाला-कांशीपुर स्थित शमलात भूमि का मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। करीब 18 वर्ष पुराने शमलात भूमि विवाद में अदालत ने फैसला सुनाते हुए अशोक कुमार व अन्य की सिविल अपील खारिज कर दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने निचली अदालत के जनवरी 2015 के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें राजस्व अभिलेखों में गैर-कब्जेदार किरायेदार के रूप में दर्ज करने के आदेश को अवैध और शून्य माना गया था।
मामला पांवटा साहिब के पुरुवाला-कांशीपुर स्थित शमलात भूमि से जुड़ा है। अपीलकर्ताओं का दावा था कि उनके पिता वर्षों से भूमि पर किरायेदार के रूप में काबिज थे और उन्हें राजस्व रिकॉर्ड में गैर-कब्जेदार किरायेदार दर्ज किया जाना चाहिए। वहीं वादियों ने आरोप लगाया कि यह प्रविष्टि धोखाधड़ी और गलत तथ्यों के आधार पर कराई गई तथा अन्य सह-भूस्वामियों को प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि कथित किरायेदारी के समर्थन में न तो कोई लिखित समझौता, न किराया रसीद और न ही अन्य विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। केवल बयान के आधार पर राजस्व प्रविष्टि बदलना कानून सम्मत नहीं माना जा सकता।
फैसले में उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि शमलात भूमि के सैकड़ों सह-भूस्वामियों को बिना सुने केवल एक पक्ष के आधार पर आदेश पारित करना न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत है। अदालत ने माना कि सह-भूस्वामी को दूसरे सह-भूस्वामी का किरायेदार मानने का दावा स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के निर्णय और डिक्री को बरकरार रखा तथा स्पष्ट किया कि 2 अप्रैल 2007 का राजस्व आदेश संबंधित पक्षों के अधिकारों पर प्रभावी नहीं माना जा सकता।