याचिकाकर्ताओं ने केवल अपना पासपोर्ट रिन्यू कराने की मांग की थी, न कि तुरंत विदेश यात्रा पर जाने की अनुमति मांगी थी। पासपोर्ट रिन्यू होने के बाद भी यदि संबंधित व्यक्ति को विदेश यात्रा करनी है तो उसे उस ट्रायल कोर्ट से अनुमति लेनी होगी, जहां उसका आपराधिक मामला चल रहा है। खंडपीठ ने एकल जज के 25 जून 2025 के आदेशों को सही ठहराते हुए निर्देश दिया कि कानून के अनुसार आवेदकों के पासपोर्ट रिन्यू किए जाएं। हालांकि, यह साफ कर दिया गया कि पासपोर्ट का उपयोग करके विदेश यात्रा करना पूरी तरह से संबंधित आपराधिक अदालतों द्वारा लगाई गई शर्तों और उनकी अनुमति के अधीन होगा। एकल पीठ ने प्रदेश के कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य सिंह और एक अन्य की ओर से दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए पासपोर्ट अथॉरिटी के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें रिन्यूअल के लिए अदालत से विदेश जाने की अनुमति लाने की शर्त लगाई गई थी।
पासपोर्ट अथॉरिटी का तर्क था कि चूंकि दोनों आवेदकों के खिलाफ ट्रायल कोर्ट में आपराधिक मामले लंबित हैं। पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट भी प्रतिकूल थी, इसलिए वे बिना संबंधित अदालत की अनुमति के पासपोर्ट रिन्यू नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च अदालत ने अपने उस फैसले में स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(एफ) आपराधिक मामले लंबित होने पर पासपोर्ट नवीनीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाती है। यह नियम केवल आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए हैं, न कि उसे स्थायी रूप से पासपोर्ट से वंचित करने के लिए। गौरतलब है कि एकल न्यायाधीश ने 26 मई 2025 के पासपोर्ट अथॉरिटी के स्पष्टीकरण पत्र को कानूनन गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया और पासपोर्ट अधिकारी को 10 दिनों के भीतर पासपोर्ट रिन्यू करने का आदेश दिया। फैसले में स्पष्ट किया था कि केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर किसी नागरिक के पासपोर्ट का नवीनीकरण (रिन्यूअल) नहीं रोका जा सकता। अदालत ने साफ किया कि पासपोर्ट रिन्यू करना और विदेश यात्रा की अनुमति देना दो अलग-अलग बातें हैं।