ठियोग (रामपुर बुशहर)। शुक्रवार को दोपहर बाद तीन बजे जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पार्थिव देह ठियोग पहुंची तो पूरा क्षेत्र राजा साहब अमर रहे के नारों से गूंज उठा। पहाड़ी राज्य के लोकप्रिय नेता वीरभद्र सिंह की पार्थिव देह ठियोग के उसी लोक निर्माण विश्राम गृह के समक्ष थी, जहां वह कभी घंटों बैठा करते थे। सभी लोग नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि देते रहे।
ठियोग अपर शिमला का मुख्यद्वार है और यहां से उन्हें राजनैतिक चुनौतियां भी मिलती रही, लेकिन उन्होंने अपनी कुशल राजनैतिक समझ से उन पर विजय पाई। साढ़े तीन दशकों तक वह प्रदेश की राजनीति की धुरी रहे। कांग्रेस हो या दूसरे दल के नेता सभी पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की नजर अपनी ओर प्यार भरी चाहते थे। बिना उनका आसरा लिए कोई जीतने की सोच नहीं सकता था। अपने विरोधियों से निपटने के लिए उनके पास अस्त्रों की कमी नहीं थी। वह जनता के नेता थे और जनता से जुड़े रहना जानते थे। ठियोग के आलू मैदान में उनकी चुनावी सभा का कांग्रेस प्रत्याशियों को इंतजार रहता था। वह क्या कहेंगे, किसे हराने या जीताने का इशारा अपनी खास शैली में करेंगे, कोई नहीं जानता था। बाद में चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलता था कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह क्या चाहते थे। साहित्य, कला, लोक संस्कृति और देवनीति सभी पर उनकी पकड़ थी। जब उन्होंने प्रदेश में राजनीति शुरू की तो घंटों पैदल चलकर पहाड़ी गांवों में वोट मांगने जाना पड़ता था। वह हर पहाड़ी आदमी का दर्द जानते थे। समस्याओं को समझकर उनका निराकरण करते थे। अधिकारियों को वह जो निर्देश देते, उसका पालन होता था। पत्रकारों, लेखकों के प्रति उनका स्नेह था। वह सभी को पूरा सम्मान देते थे। ठियोग के लोगों को हालांकि उनसे शिकायतें भी रहीं लेकिन सभी उनका सम्मान व आदर दिल से करते थे।