कच्ची-संकरी सड़क पर 5 किलोमीटर तक दौड़ा 4,500 लीटर का दमकल वाहन
. दमकल चालक विक्रांत की बहादुरी को ग्रामीणों ने किया सलाम
सुनील ग्राेवर
ठियोग (रामपुर बुशहर)।
शिरगुली गांव में भीषण आग ने दो परिवारों के आशियाने छीन लिए। वहीं, चौपाल दमकल की टीम ने साहस, सूझबूझ और त्वरित कार्रवाई से पूरे गांव को चपेट में आने से बचा लिया। गांव तक पहुंचने के लिए दमकल टीम के आगे कच्ची और संकरी सड़क बड़ी चुनौती बन गई थी। गांव की यह सड़क बेहद संकरी और कच्ची है। इसके बावजूद दमकल विभाग के हीरो 52 मिनट में पहुंचे और गांव को आग की चपेट में आने से बचाया। वहीं, ग्रामीणों का कहना है कि यदि दमकल कर्मियों ने समय रहते मोर्चा नहीं संभाला होता, तो आग गांव के कई मकानों को अपनी चपेट में ले सकती थी और तबाही का दायरा कई गुना बढ़ जाता। सबसे अधिक चर्चा चौपाल अग्निशमन केंद्र के फायर वाटर टेंडर चालक विक्रांत की हो रही है, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर 4,500 लीटर क्षमता वाले भारी-भरकम दमकल वाहन को अरली धार से शिरगुली गांव तक पहुंचाया। यह रास्ता करीब पांच किलोमीटर लंबा, बेहद संकरा और कच्चा है। ग्रामीणों के अनुसार आज तक इस मार्ग पर इतना बड़ा वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाया था। ग्रामीणों ने कहा कि कई जगह सड़क इतनी संकरी थी कि वाहन के एक तरफ गहरी ढलान और दूसरी तरफ पहाड़ी थी, लेकिन चालक विक्रांत ने धैर्य और साहस का परिचय देते हुए वाहन को सुरक्षित घटनास्थल तक पहुंचाया।
सूचना मिलते ही शुरू हुआ जीवन बचाने का मिशन
अग्निशमन विभाग को देहा पुलिस चौकी से दोपहर 3 बजकर 14 मिनट पर आग लगने की सूचना मिली। सूचना मिलते ही चौपाल अग्निशमन केंद्र के प्रभारी सुरेंद्र कुमार ने टीम को रवाना किया। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद टीम करीब 52 मिनट में घटनास्थल पर पहुंच गई। प्रभारी सुरेंद्र कुमार के नेतृत्व में फायरमैन रमन शर्मा, रमाकांत, पवन दत्ता, नितीश कुमार, नवीन पब्टा और अतिरिक्त चालक संजय कुमार ने आग पर काबू पाने के लिए मोर्चा संभाला। तेज हवाओं और लकड़ी से बने पहाड़ी मकानों के बीच आग लगातार फैल रही थी, लेकिन दमकल कर्मियों ने घंटों तक संघर्ष करते हुए उसे आगे बढ़ने से रोक दिया।
लकड़ी के मकान और तेज हवाएं बनीं बड़ी चुनौती
शिरगुली गांव के अधिकांश मकान पारंपरिक पहाड़ी शैली में बने हैं, जिनमें लकड़ी का व्यापक उपयोग होता है। इन दिनों भीषण गर्मी के कारण लकड़ी पूरी तरह सूख चुकी है, जिससे आग तेजी से फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऊपर से तेज हवाओं ने आग को और अधिक खतरनाक बना दिया था। दमकल कर्मियों के सामने चुनौती केवल आग बुझाने की नहीं थी, बल्कि उसे गांव के अन्य मकानों तक पहुंचने से रोकने की भी थी। यदि आग फैल जाती तो पूरा गांव एक बड़े हादसे का शिकार हो सकता था। इस बचाव अभियान में चौपाल से 4500 लीटर क्षमता वाला वाटर टेंडर और एक क्यूआरवी, देहा से 4,500 लीटर क्षमता वाला वाटर टेंडर और एक क्यूआरवी, कोटखाई से एक फायर टेंडर और एक क्यूआरवी पहुंचे। इन सभी टीमों ने समन्वय के साथ कार्य करते हुए आग को नियंत्रित किया और गांव के बाकी हिस्से को सुरक्षित बचा लिया।
सड़क व्यवस्था पर उठे सवाल
इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों की सड़क व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि अरली धार से शिरगुली तक की सड़क पक्की और चौड़ी होती, तो दमकल वाहन 15 से 20 मिनट पहले घटनास्थल तक पहुंच सकते थे। ऐसी स्थिति में संभवतः सेबी रमाइक के मकान को भी बचाया जा सकता था। ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि दूरदराज के गांवों तक जाने वाली सड़कों को प्राथमिकता के आधार पर चौड़ा और पक्का किया जाए, ताकि अग्निकांड, स्वास्थ्य आपातकाल और अन्य आपदाओं के दौरान राहत दल समय पर पहुंच सके।
देहा के शिरगुली गांव में मकानों में लगी आग। संवाद