नेरवा (रोहड़ू)। बारिश होने से मार्च और अप्रैल महीने में जंगलों में गुच्छी की अच्छी पैदावार हो रही है। बीते 15 दिनों से उपमंडल चौपाल और कुपवी के देवदार के वन गुच्छी की पैदावार से गुलज़ार हो रहे हैं। लोग दिन का खाना लेकर सुबह ही गुच्छी की तलाश में जंगलों की तरफ निकल जाते हैं और गुच्छी की तलाश में देर शाम तक जंगलों में घूम का घर लौटते हैं। गुच्छी का सीजन शुरू होते ही व्यापारियों ने गांव-गांव घूमकर गुच्छी एकत्रित करनी शुरू कर दी है।
गुच्छी को जोड़ते हैं भाग्य से
लोक मान्यता के अनुसार, गुच्छी को भाग्य से जोड़कर भी देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि गुच्छी किस्मत वालों को ही नजर आती है। कई लोगों को तो मुंह के सामने उगी हुई गुच्छी भी नजर नहीं आती है, जबकि कई लोग एक दिन में ही हजारों रुपये कमाते हैं।
मार्कुला एस्क्यूपलेंटा है वैज्ञानिक नाम
गुच्छी का वैज्ञानिक नाम मार्कुला एस्क्यूपलेंटा है। हिंदी में स्पंज मशरूम या गुच्छी कहते हैं। यह पहाड़ों में नमी वाले स्थानों में कुदरती तौर पर उगती है। यहां इसे च्याऊं या चेऊं भी कहा जाता है। यह सफेद, भूरे और काले रंग की होती है। काले रंग की गुच्छी को सबसे अधिक गुणवत्तापूर्ण माना जाता है। गुच्छी की कीमत दस हजार रुपये प्रति किलो से अधिक रहती है। कई बार बीस हजार रुपये प्रति किलो से भी पार हो जाती है।
वैज्ञानिकों के लिए रहस्य
गुच्छी सिर्फ प्राकृतिक तौर पर उगती है और इसकी खेती करने में अभी वैज्ञानिकों को सफलता नहीं मिली है। इसके न तो आज तक बीज तैयार हो पाए और न ही उगाने की किसी अन्य विधि का पता चल पाया। पहाड़ों पर कुदरती तौर पर उगने वाली गुच्छी आज भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बनी हुई है। हालांकि, इसके व्यावसायिक उत्पादन के लिए अनुसंधान चल रहे हैं।
कुदरती तौर पर उगती है
मान्यता है कि गुच्छी फरवरी से लेकर अप्रैल माह तक आसमानी बिजली कड़कने से जंगल में कुदरती तौर पर उगती है। कुछ ही दिनों में स्वयं सूख व सड़ जाती है। ग्रामीण क्षेत्रो में बारिश के तुरंत बाद लोग घरों से इसकी तलाश में निकल पड़ते हैं।
स्वास्थ्य के लिए लाभदायक
वैज्ञानिकों की मानें तो गुच्छी में कार्बोहाईड्रेट की मात्रा शून्य होती है। यह हृदय रोग, नियूरेपिक, मोटापा, गठिया, थाइराइड, बॉन हेल्थ,मानसिक तनाव और सर्दी-जुखाम जैसी बीमारियों से लड़ने में रामबाण साबित होती है। इसका इस्तेमाल कई घातक बीमारियों को ठीक करने वाली दवाइयों के निर्माण में भी होता है, इसलिए डॉक्टर इसे संजीवनी मानते हैं।
यहां पाई जाती है
हिमाचल प्रदेश में कुल्लू, शिमला, चंबा, मंडी और सिरमौर के आलावा पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के ऊपरी इलाकों में गुच्छी काफी मात्रा में पैदा होती है। अच्छी पैदावार होने पर कई लोग इसे बेचकर लाखों रुपया तक कमा लेते हैं। अब तो हिमाचल आने वाले सैलानी भी इसके मुरीद हो रहे हैं। बड़े होटलों में इसकी स्पेशल वीआईपी डिश काफी महंगी रहती है । इसके बावजूद पर्यटक सीजन में इसकी काफी मांग बढ़ती जा रही है।