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Rampur Bushahar News: 1500 से लेकर 29 हजार तक बिक रहा ऊनी मफलर

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अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में किन्नौरी वस्त्रों की बढ़ी मांग, निरोगी रहने के लिए ऊनी वस्त्र खरीद रहे लोग
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इशिका गौतम

रामपुर बुशहर। रामपुर में सजने वाले अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में व्यापारी दूर-दूर से व्यापार करने पहुंचे हैं। किन्नौरी मार्केट में ड्राई फ्रूट से लेकर पारंपरिक किन्नौरी वस्त्रों की भारी मांग है। बाहरी राज्यों में भी पारंपरिक किन्नौरी परिधानों की डिमांड है। ऊनी मफलर की कीमत 1500 से लेकर 29 हजार रुपये तक है। किन्नौर जिले में सर्दी के पांच माह में गर्म और ऊनी वस्त्रों की काफी जरूरत रहती है। ऊन से बने पट्टू की जरूरत पहले जहां सर्द क्षेत्रों में थी, वहीं अब समय के साथ साथ रामपुर में भी किन्नौरी वस्त्रों की मांग बढ़ रही है।

अंतरराष्ट्रीय मेले में किन्नौरी पट्टू, दोहडू, लिंगचा, किन्नौरी शाॅल और मफलर सहित अन्य वस्त्रों को लोग बहुत पसंद कर रहे हैं। लोग दूर-दूर से ऊनी वस्त्रों की खरीदारी करने पहुंच रहे हैं। रामपुर के साथ-साथ बाहरी देशों में भी किन्नौरी वस्त्रों की मांग है। ऊन के वस्त्र गर्म होने के साथ-साथ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी हैं। ऊन के पट्टी की कीमत 2000 से 3000 तक है। किन्नौरी पट्टू को बनाने में करीब एक माह लगता है। पट्टू की लंबाई लगभग 110 इंच तक होती है। इसकी कीमत 13 हजार से 40 हजार तक है। वहीं, दोहड़ू 16 से 17 दिन में तैयार किया जाता है। इसकी कीमत 12 हजार से 45 हजार तक है। इन्हें कड़ी मेहनत से हाथों से तैयार किया जाता है। वहीं, मफलर की कीमत 1500 से 29 हजार रुपये तक होती है, जो कार्यक्रम में मेहमानों को पहनाया जाता है। किन्नौरी टोपी 450 से 700 तक की बिकती है। शॉल जो महिलाएं अक्सर सर्दियों में पहनती है। एक डिजाइन वाले शॉल की कीमत 6000 से 7000 रुपये है। तीन डिजाइन वाले शॉल की कीमत 12 से 15 हजार रुपये तक है। शॉल की अधिकतम कीमत 20 हजार है। लवी मेले में सांगला वैली के चांसू से पहुंचे कारोबारी दिव्या और उनके पति विद्या सागर ने कहा कि पिछले चार साल से अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में दुकान लगा रहे हैं। उनसे पहले उनके माता-पिता 30 साल से लवी मेले में व्यापार कर रहे हैं। मेले में क्षेत्र के लोगों की किन्नौरी वस्त्रों में पट्टू, शॉल, दोहडू, किन्नौरी टोपी और मफलर की अधिक मांग है। वहीं, जिले के ब्रुआ श्यामा नंद ने कहा कि पिछले छह वर्षों से मेले में ऊनी कंबल, पट्टे, धागा और रस्सी बेचते हैं। हाथ से बनने वाले ऊनी वस्त्रों की मांग किन्नौर सहित अन्य क्षेत्रों में भी है। वह 20 साल से बिना किसी मशीन की ऊनी कंबल सहित अन्य वस्त्र बनाते हैं। यशवंती ने बताया कि किन्नौर मार्किट में 4500 हजार रुपये तक किन्नौरी शॉल उपलब्ध है, जिनकी मांग देश और विदेशों में भी रहती है।
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हाथों से होता है हर काम

भेड़-बकरियों से ऊन निकालने के बाद ऊन को धोना, पिजाई, काटना और रोल कर धागा बनने के बाद रंग किया जाता है। सारा कार्य हाथों से ही किया जाता है, जिससे किन्नौरी वस्त्र बनाए जाते हैं, जो गर्म होने के साथ-साथ किन्नौर की पारंपरिक वेशभूषा भी है। ऊन की पट्टी बनने के बाद उससे कोट, शॉल और मफलर सहित अन्य वस्त्र बनाए जाते हैं। स्वास्थ्य लाभकारी के साथ-साथ ये काफी आकर्षक भी होते हैं।
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