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Rampur Bushahar News: देव समाज बोला, आस्था के मंच पर हथियार जरूरी नहीं

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कुलगांव की घटना के बाद परंपरा समाज हित के लिए नहीं सही
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हर्ष फायरिंग के बढ़ते चलन पर जताई चिंता
परंपरा के नाम पर शक्ति प्रदर्शन का आरोप
कुलगांव हादसे पर जताई चिंता
नशे और जोश में हादसे का खतरा
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम की जरूरत
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहडू। धार्मिक आयोजनों में बंदूकों और हर्ष फायरिंग के बढ़ते प्रचलन पर अब न केवल प्रशासन, बल्कि देव समाज भी सवाल खड़े कर रहा है। कुलगांव में हाल ही में हुई हर्ष फायरिंग की घटना ने साफ कर दिया है कि परंपरा के नाम पर जारी चलन अब समाज के लिए खतरा बनता जा रहा है।
देव परंपराओं से जुड़े लोगों का कहना है कि आस्था के मंच पर हथियारों का प्रदर्शन पूरी तरह अनुचित है। उनका मानना है कि पुराने समय में देवताओं की रक्षा के लिए कुछ लोग हथियारों के साथ चलते थे, लेकिन वर्तमान समय में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। देव संस्कृति सदियों से अनुशासन, श्रद्धा और सामूहिक सद्भाव की प्रतीक रही है, लेकिन अब कुछ लोग इसे शक्ति प्रदर्शन और दिखावे का माध्यम बना रहे हैं।
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प्रशासन भी पिछले कुछ वर्षों से इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के प्रयास कर रहा है। गवास गांव और दलगांव के भूंडा जैसे आयोजनों में जागरूकता के चलते हथियारों के प्रदर्शन में कुछ कमी जरूर आई है, लेकिन पूरी तरह से इस पर नियंत्रण नहीं हो पाया है। निर्देश और अपील तक सीमित कार्रवाई के कारण लापरवाही की घटनाएं सामने आ रही हैं, जो गंभीर हादसों का कारण बन रही हैं।
कुलगांव में हालिया घटना में एक महिला की मौत ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। ऐसे आयोजनों में अक्सर लोग जोश या नशे में नियंत्रण खो बैठते हैं। इससे हादसों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी है।
आयोजन तंत्र जवाबदेह हो
प्रतिबंध और चेतावनी के बाद हथियारों को लहराने वाले व हर्ष फायर करने वालों के लाइसेंस रद्द किए जाएं। इसके आयोजकों को भी जिम्मेदार ठहराया जाए। यदि किसी कार्यक्रम में फायरिंग होती है, तो केवल ट्रिगर दबाने वाला ही नहीं, बल्कि पूरा आयोजन तंत्र जवाबदेह होना चाहिए।
-त्रिलोक चौहान, अधिवक्ता
लोगों का करना होगा विरोध
जब तक लोग खुद ऐसी प्रवृत्तियों का विरोध नहीं करेंगे, तब तक बदलाव संभव है लेकिन समय लगेगा। कुलगांव में गोली से महिला की मौत के बाद आस्था के नाम पर होने वाली लापरवाही सामने आई है। धार्मिक आयोजनों को सुरक्षित और मर्यादित बनाया जाए, जहां श्रद्धा हो हथियार नहीं।
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-भवानी दत्त शर्मा, भंडारी, दुर्गा माता मंदिर हाटकोटी
हथियारों से परेहज जरूरी
वक्त के साथ परंपराओं को भी बदला जा सकता है। पहले खूंद अपनी शान के लिए हथियारों के साथ चलते थे। आज के दौर में सुरक्षा और कानून का पालन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। जो हादसा हुआ, उसने पूरे क्षेत्र को दुख और पीड़ा में डाल दिया है। अब हथियारों के उपयोग से परहेज की जरूरत है।
-उत्तम चंद मोतमीन, देवता शालू कुलगांव
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