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Rampur Bushahar News: देश के सबसे ऊंचे मतदान केंद्र पहुंच बंगलुरु के शंकर ने दिया फिटनेस का संदेश

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कसौली से शुरू की यात्रा 15,256 फीट की ऊंचाई पर स्थित ताशीगंग में संपन्न हुई
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संवाद न्यूज एजेंसी
ठियोग(रामपुर बुशहर)।


जहां अधिकांश लोग हिमालय की वादियों में सुकून तलाशने पहुंचते हैं, वहीं बेंगलुरु मूल के 54 वर्षीय एनआरआई शंकर मुनियप्पा ने यहां अपनी सीमाओं को परखने का फैसला किया। उम्र को चुनौती देते हुए शंकर ने किन्नौर और स्पीति की दुर्गम पहाड़ियों में 646 किलोमीटर लंबी एकल और बिना किसी सहायता वाली साइकिल यात्रा पूरी कर युवाओं के साथ हर आयु वर्ग के लोगों के लिए प्रेरणा पेश की है। उनकी यह यात्रा कसौली से शुरू हुई और 15,256 फीट की ऊंचाई पर स्थित सबसे ऊंचे मतदान केंद्र ताशीगंग पर समाप्त हुई।

शंकर मुनियप्पा सामाजिक सवाल स्वयवसेवी संस्था के संस्थापक हैं। उनकी संस्था लोगों को फिटनेस और स्वस्थ जीवनशैली के लिए प्रेरित करती है। अप्रैल में उन्होंने यह साबित करने के लिए खुद मैदान में उतरने का फैसला किया कि फिटनेस केवल ऐप या जिम तक सीमित नहीं, बल्कि जीवनभर का संकल्प है। 30 अप्रैल को कसौली से शुरू हुई यह कठिन यात्रा चैल, नारकंडा, रामपुर, सांगला, छितकुल, कल्पा, रोधी पीक, पूह, नाको, ताबो और काजा जैसे दुर्गम इलाकों से होकर गुजरी।
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यात्रा के दौरान सबसे बड़ा संकट तब आया जब छितकुल पहुंचने के बाद उनकी साइकिल में गंभीर तकनीकी खराबी आ गई। यह खराबी उनकी पूरी मुहिम को बीच में रोक सकती थी, लेकिन शंकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने करीब 300 किलोमीटर दूर शिमला से जरूरी पार्ट्स जुटाए। अलग-अलग साइकिलों के हिस्सों से समाधान तैयार किया और फिर दोबारा कल्पा लौटकर वहीं से अपनी यात्रा शुरू की जहां से रुकी थी।
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इस कठिन अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि रही ताशीगंग तक पहुंचना, जो भारत का सबसे ऊंचा मतदान केंद्र माना जाता है और समुद्र तल से 15,256 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। शंकर मुनियप्पा का कहना है कि हिमालय ने उन्हें केवल चुनौतियां ही नहीं दीं, बल्कि जीवन के गहरे अनुभव भी दिए। उन्होंने कहा कि कठिन मौसम, बर्फीली ठंड और तकनीकी परेशानियों के बावजूद हिमाचल के लोगों की मेहमाननवाजी और संस्कृति ने इस यात्रा को यादगार बना दिया। 54 वर्ष की आयु में इस तरह की कठिन साइकिल यात्रा पूरी कर शंकर ने यह संदेश दिया है कि फिटनेस उम्र की मोहताज नहीं होती। उनका मानना है कि जीवन में जोखिम उठाना और लगातार आगे बढ़ते रहना ही असली सफलता है। उनकी यह यात्रा आज के युवाओं और समाज के लिए यह प्रेरणा है कि मजबूत इच्छाशक्ति के सामने कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।
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