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Rampur Bushahar News: सेब बगीचों में लगा कैंकर रोग, बागवान चिंतित

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तनों और टहनियों में नजर आ रहे छाल सूखने के लक्ष्ण
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अक्तूबर से मार्च तक कैंकर से पौधों को बचाना जरूरी : डाॅ. नरेंद्र
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। पहले बारिश अब तेज धूप के कारण सेब के बगीचे कैंकर रोग से प्रभावित हो रहे हैं। यह रोग कैंसर की तरह सेब के पेड़ों को नष्ट कर रहा है। इससे पेड़ों के तने सूखने लगे हैं। निचले और मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों के बगीचों में सेब के पेड़ों को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है।
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दिन के समय चटख धूप और गर्मी बढ़ने से पेड़ों के तनों की चमड़ी काली पड़ रही है। बागवानों का कहना है कि कि सेब के बगीचे कैंकर से खत्म हो रहे हैं। इससे सेब के पेड़ों की टहनियाें के सूखने का क्रम जारी है। साल दर साल पर्यावरण में आए बदलावों का सेब बागवानी पर बहुत बुरा असर पड़ा है। बगीचों में समय से पहले पत्तझड़ उसके बाद पत्तों में असमय फूल निकलना, अब कैंकर से क्षेत्र के बागवानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें छा गई हैं। लगातार मौसम की मार के कारण बागवानी करना बागवानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। बागवानी विशेषज्ञ डाॅ. नरेंद्र कायथ का कहना है कि कैंकर के लक्षण शुरू से पौधे में रहते हैं। तने और हटनियों के जिस भाग पर तेज घूप पड़ती है वहां पर छाल का फटना और काला पड़ना कैंकर के लक्षण हैं। अक्तूबर से मार्च तक कैंकर से पौधों को बचाना जरूरी है। पत्तझड़ और कटिंग के बाद पौधों में कैंकर वाले भाग को खरोंच कर उसमें पेस्ट लगाया जाता है। समय पर संक्रमण रुकने के बाद वहां नई छाल निकल आती है। यदि समय पर अनदेखा किया गया तो टहनियां सूख जाती हैं। उनकाे हटाना जरूरी होता है। इसके लिए सही प्रबंधन की जरूरत रहती है।
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