पंचायतों ने चेताया, अवैध रूप से लाए पशु तुरंत नहीं हटाए गए, तो कब्जे में लेकर खुली बोली में बेचेंगे
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रामपुर बुशहर। किन्नौर जिले के प्रवेशद्वार पर स्थित चौरा और तरांड़ा पंचायतों ने वन क्षेत्रों में बिना परमिट लाए जा रहे बाहरी लोगों के पशुओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। पंचायतों ने चेतावनी दी है कि अवैध रूप से लाए गए पशु तुरंत क्षेत्र से नहीं हटाए गए, तो उन्हें कब्जे में लेकर नियमानुसार खुली बोली में बेचा जाएगा। इन मुद्दों को लेकर रविवार को पंचायत प्रतिनिधियों ने बैठक कर चर्चा भी की। पंचायत प्रतिनिधियों ने कहा कि बार-बार चेतावनी के बावजूद गुज्जर समुदाय से जुड़े कुछ लोग बिना परमिट के अधिक संख्या में भैंस, घोड़े और भेड़-बकरियां को चौरा और तरांडा के वन क्षेत्रों में ला रहे हैं। इससे स्थानीय पशुपालकों को चारे की समस्या हो रही है और वन संसाधनों को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है।तरांड़ा पंचायत के उपप्रधान गोविंद मोयान, दुर्गा माता मंदिर के मोतमिन शेर सिंह नेगी, चौरा पंचायत के प्रधान विजय नेगी और उपप्रधान जय सिंह ने कहा कि गुज्जर समुदाय के कुछ लोग दूसरे व्यक्ति के नाम से परमिट लेकर आ रहे हैं, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है। पंचायतें अब कड़ी कार्रवाई के लिए तैयार हैं।
वन विभाग के पशुओं की संख्या तीन गुना तक बढ़ा दी है। वन विभाग ने पहले की अपेक्षा पशुओं की संख्या बढ़ाकर परमिट जारी किए हैं, जबकि पूर्व में हुए समझौतों के अनुसार पशुओं की संख्या घटाई जानी थी। प्रतिनिधियों ने कहा कि अब वन अधिकारी मौके पर गए बिना ही छह-छह साल के लिए परमिट जारी कर रहे हैं, जबकि पूर्व में वन खंड अधिकारी मौके पर जाकर वहां मवेशियों के साथ मौजूद लोगों को एक वर्ष के लिए परमिट जारी करते थे।
तरांड़ा पंचायत उपप्रधान गोविंद मोयान ने बताया कि जल्द ही पुलिस, राजस्व, वन और पशुपालन विभाग का एक संयुक्त निरीक्षण दल क्षेत्र की स्थिति का जायजा लेने के लिए जंगलों और चरागाहों की जमीन की जांच करेगा। वर्तमान में पंजाब, शिमला, ठियोग और मतियाना के आसपास से भी गुज्जर समुदाय के लोग पशु उनके कंडे में ला रहे हैं और गुज्जर पशु देख भाल के लोगों से मोटा पैसा वसूल रहे हैं। वहीं, ग्रामीणों ने शिकायत की है कि भारी संख्या में पशु और भैंसों के एक ही क्षेत्र में लगातार आने से अब घास उगना कम हो गया है और जो घास उग रही है, वह सही नहीं है। ऐसे में स्थानीय लोगों के मवेशियों को चारा नहीं मिल रहा। वहीं, बाहरी पशुपालक स्थानीय पशुपालकों को अपने पारंपरिक चराई क्षेत्र में पशु नहीं ले जाने दे रहे हैं।