टमाटर, सब्जियां उगाकर किसान आर्थिकी को कर रहे मजबूत
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ज्वार, बाजरा, चौलाई और कोदा की फसलों को हो रहा नुकसान संवाद न्यूज एजेंसी
नेरवा (रोहड़ू)। बीते कुछ वर्षों से भारत सरकार मोटे अनाजों की खेती और मोटे अनाजों के सेवन पर बल दे रही है। प्रदेश सरकार भी लोगों को इनके इस्तेमाल से होने वाले फायदों से अवगत करवा रही है और अभियान चला रही है। इसके विपरीत अधिकतर किसान बीते कुछ वर्षों से मोटे अनाजों की परंपरागत खेती से विमुख होते जा रहे हैं। टमाटर, सब्जियों व अन्य नकदी फसलों की ओर रुख करने से किसानों की आर्थिकी काफी मजबूत हुई है। नकदी फसलों से मिलने वाले अधिक आर्थिक लाभ के कारण पर्वतीय क्षेत्रों की पहचान मानी जाने वाली परंपरागत फसलें लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। अधिकांश किसान टमाटर, सब्जिनां और अन्य नकदी फसलों से जुड़कर अपनी आर्थिकी को सुदृढ़ करने में सफल हुए हैं। एक दशक पूर्व अधिकांश किसान बाजार से राशन बिलकुल भी नहीं खरीदा करते थे। खेतों में जी तोड़ मेहनत कर गेहूं, मक्की, ज्वार, बाजरा, चौलाई और कोदा (मंढ़वा) उगाकर अपने परिवार के गुजारे लायक पूरे साल के राशन का उत्पादन करते थे। अतिरिक्त पैदा किए गए अनाज को हाट बाजारों में बेचकर नमक, मसाले और घर के इस्तेमाल की वस्तुएं खरीद लिया करते थे। किसानों की ओर से पैदा किए गए यह अनाज पूरी तरह जैविक हुआ करते थे। इनमें रसायनों का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं होता था। अब कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों के अधिकांश किसान बीते दो दशक से टमाटर की खेती से जुड़ चुके हैं। टमाटर की फसल पूरी तरह मौसम पर निर्भर रहती है। मौसम के अनुकूल रहने पर किसान मालामाल हो जाते हैं। जैसा की बीते कुछ वर्षों से हो रहा है। किसानों को टमाटर के अच्छे दाम मिल रहे हैं। टमाटर के अलावा किसानों ने बेमौसमी नकदी सब्जियां भी उगानी शुरू कर दी है। किसानों के इस ओर रुझान का सबसे बड़ा कारण यह है कि एक तो टमाटर और सब्जियां उगाने में मेहनत व समय दोनों कम लगते हैं। इसके अतिरिक्त कम भूमि पर ज्यादा औसत निकलती है। टमाटर व सब्जियों की मंडियों में मांग भी अधिक रहती है। इनके नकद दाम हासिल हो जाते हैं। दूसरी तरफ अन्य परंपरागत फसलों में एक तो मेहनत ज्यादा लगती है। इसके लिए भूमि भी ज्यादा चाहिए होती है। इनमें मेहनत के हिसाब से किसान को औसत भी नहीं मिल पाती। इन सभी कारणों से किसान परंपरागत फसलों से विमुख होकर नकदी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
बागवानों ने कहा
केदी के प्रगतिशील किसान सूरत राम शर्मा, कीमा चंद्रावाली के सलीमो दीन, झिकनीपुल के विशाल चौहान और क्यारला के किसान कंवर सिंह ठाकुर ने बताया कि मोटे अनाजों की खेती अब आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रही है। पारंपरिक फसलों में मेहनत और समय भी अधिक लगता है। इसके बाद इन फसलों की लागत और दाम भी बेहतर नहीं होते, जिससे किसानों की आर्थिकी मजबूत हो सके। वहीं, नकदी फसलों में मेहनत कम, लागत अधिक और दाम भी बेहतर मिल जाते हैं। इस कारण नेरवा में किसानों को रूझान पारंपरिक फसलों के प्रति कम हुआ है और नकदी फसलों की और बढ़ा है।