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Rampur Bushahar News: 648 ग्राम चरस मामले में आरोपी बरी, स्वतंत्र गवाह मुकरा

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648 ग्राम चरस मामले में अभियुक्त बरी, स्वतंत्र गवाह मुकरा
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648 ग्राम चरस मामले में अभियुक्त बरी, स्वतंत्र गवाह मुकरा. गवाह बोला, जांच अधिकारी के कहने पर खाली दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए
संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर।
ठियोग स्थित विशेष न्यायाधीश-II शिमला की अदालत ने एनडीपीएस अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी को बरी कर दिया है। आरोपी पर एक जनवरी 2021 को 648 ग्राम चरस रखने का आरोप था। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष अपना मामला उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक जनवरी 2021 को शाम करीब 7:30 बजे ठियोग पुलिस ने बेखलटी में इंद्र सिंह को रोका था। पुलिस का दावा था कि इंद्र सिंह ने पुलिस को देखकर एक थैला सड़क के नीचे फेंक दिया था। इस थैले में 648 ग्राम चरस होने का आरोप था। पुलिस ने इस मामले में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 20 के तहत चालान पेश किया था। पुलिस ने एक व्यक्ति को स्वतंत्र गवाह के तौर पर शामिल किया था। हालांकि, अदालत में स्वतंत्र गवाह ने अभियोजन पक्ष के दावे का समर्थन नहीं किया। उसने कहा कि उसकी मौजूदगी में कोई तलाशी या जब्ती नहीं हुई थी। उसने यह भी बताया कि उसने खाली कागजों पर हस्ताक्षर किए थे। बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि पुलिस गवाहों के बयानों में विरोधाभास थे। अदालत ने पाया कि स्वतंत्र गवाह ने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं किया। उसने कहा कि पुलिस ने उसे बताया था कि उन्होंने इंद्र सिंह से चरस बरामद की है। उसने इस बात से इनकार किया कि उसकी मौजूदगी में थैले की जांच की गई या चरस का वजन किया गया। उसने यह भी कहा कि चरस पहले से ही सील की हुई थी जब वजन किया गया। उसने जांच अधिकारी के कहने पर खाली दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। उसकी गवाही ने अभियोजन पक्ष की तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए।
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अदालत ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने संजीव कुमार सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में कहा था कि यदि स्वतंत्र गवाह मुकर जाते हैं, तो अभियोजन का मामला कमजोर हो जाता है। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने दिवाकर बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले में भी इसी तरह का रुख अपनाया था। इन निर्णयों में कहा गया है कि अपराध जितना गंभीर होता है, सबूत का स्तर उतना ही सख्त होना चाहिए। अभियोजन पक्ष पर अभियुक्त के अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने का प्रारंभिक भार होता है। यदि अभियोजन पक्ष इस भार को पूरा करने में विफल रहता है, तो अभियुक्त को संदेह का लाभ मिलता है।
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