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Himachal: जलरक्षक के पद पर हुई नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, जानें हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले

Tue, 21 Jul 2026 06:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी उम्मीदवार को उसके दावे के अनुसार पूरे अंक दे भी दिए जाएं, तब भी वह मेरिट में शीर्ष पर रहे चयनित उम्मीदवार को नहीं पछाड़ सकता। ऐसी स्थिति में नियुक्ति को रद्द करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जलरक्षक के पद पर हुई नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि अंकों में कथित विसंगति के बावजूद याचिकाकर्ता मेरिट में चयनित उम्मीदवार से काफी पीछे है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी उम्मीदवार को उसके दावे के अनुसार पूरे अंक दे भी दिए जाएं, तब भी वह मेरिट में शीर्ष पर रहे चयनित उम्मीदवार को नहीं पछाड़ सकता। ऐसी स्थिति में नियुक्ति को रद्द करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। याचिकाकर्ता रवि कुमार ने सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग में जलरक्षक के पद पर हुई भर्ती के परिणाम को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि चयन समिति ने आयु के मापदंड के तहत उसे मिलने वाले अंकों को नहीं जोड़ा।

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उसने अदालत से मांग की थी कि चयनित उम्मीदवार (राजिंदर कुमार) की नियुक्ति को रद्द किया जाए और उसे उचित अंक देकर नौकरी दी जाए। विभाग की नीति के अनुसार जल रक्षक भर्ती में 26 से 36 वर्ष की आयु वाले उम्मीदवारों को अधिकतम 15 अंक मिलने थे। आवेदन के समय याचिकाकर्ता की उम्र 27 वर्ष थी, इसलिए वह नियमानुसार 15 अंक पाने का हकदार था, जो उसे नहीं दिए गए थे। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी कि चयनित उम्मीदवार को गलत तरीके से अंक दिए गए हैं। चयनित उम्मीदवार ने इंटरव्यू और अन्य मानदंडों को मिलाकर कुल 91 अंक हासिल किए थे, जो पूरी तरह से वैध पाए गए। जबकि याचिकाकर्ता को केवल 61 अंक मिले थे। यदि याचिकाकर्ता की शिकायत को सही मानकर उसे उम्र के तहत काटे गए 15 अंक दे भी दिए जाएं, तो भी उसका कुल स्कोर 61 से बढ़कर 76 अंक ही होगा। इसके बावजूद वह चयनित उम्मीदवार के 91 अंकों से बहुत पीछे रह जाता है।

फैसला-2

चेक बाउंस मामले में दोषी को दो माह में आत्मसमर्पण करने का आदेश
वहीं प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में दोषी को दो महीने के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए दोषी राकेश कुमार की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दो निचली अदालतों के एक समान फैसलों के बाद हाईकोर्ट साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन में हस्तक्षेप तभी करता है, जब कोई गंभीर कानूनी विफलता दिखी हो, जो इस मामले में नहीं थी। हाईकोर्ट ने आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने के मिले 10 से अधिक मौकों का लाभ न उठाने पर याचिका को खारिज कर दिया और अंतरिम राहतें रद्द कर दीं। यह मामला 2013 का है, जब राकेश कुमार ने अपने परिचित शिकायतकर्ता विशाल पठानिया से 2,70,000 की राशि उधार ली थी। इसे चुकाने के लिए उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक का एक चेक जारी किया, जो नवंबर 2013 में खाते में अपर्याप्त राशि होने के कारण बाउंस हो गया। निचली अदालत ने आरोपी को 3 महीने की कैद और 3,50,000 मुआवजे की सजा सुनाई थी, जिसे सत्र न्यायालय ने भी सही ठहराया। हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी ने चेक पर अपने हस्ताक्षरों से इन्कार नहीं किया। आरोपी का यह बचाव कि चेक कोरा था, कोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थापित कानून के तहत यदि चेक पर हस्ताक्षर असली हैं, तो भी आरोपी धारा 138 के तहत जिम्मेदार होगा।

फैसला-3

फील्ड कानूनगो को राहत, 1.10 लाख की रिकवरी का आदेश रद्द
प्रदेश हाईकोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए विभाग की ओर से जारी रिकवरी आदेश रद्द कर दिए हैं। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी की पीठ पीछे तैयार की गई मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर उससे पैसों की वसूली नहीं की जा सकती। एसडीओ (सिविल) की जांच रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने कहा कि मूल्यांकन में जो विसंगति दिखाई दे रही थी, वह प्रशासन द्वारा समय पर कुछ बिलों और मस्टररोल का सत्यापन न करने के कारण थी। प्रशासनिक लापरवाही का ठीकरा कर्मचारी पर नहीं फोड़ा जा सकता। इस रिपोर्ट में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि याचिकाकर्ता ने किसी गलत इरादे से या धोखाधड़ी करके ज्यादा राशि का प्रमाणपत्र हासिल किया था। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि अधिकारियों द्वारा बाद में किया गया मूल्यांकन याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति में किया गया था। उन्हें इस प्रक्रिया में कभी शामिल ही नहीं किया गया।

रिपोर्ट को तैयार करने में याचिकाकर्ता की कोई सहभागिता ही नहीं थी
इसलिए, जिस रिपोर्ट को तैयार करने में याचिकाकर्ता की कोई सहभागिता ही नहीं थी, उसके आधार पर उनसे कथित गैर-उपयोग की गई राशि की वसूली नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ता चतर सिंह 2017 में बिलासपुर जिले की तहसील घुमारवीं के तहत कुठेड़ा में फील्ड कानूनगो थे। उन्हें फील्ड कानूनगो भवन की मरम्मत और निर्माण कार्य के लिए 2,50,000 की राशि स्वीकृत की गई थी। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद संबंधित अधिकारियों ने उपयोगिता प्रमाणपत्र भी जारी कर दिया। इसमें कहा गया कि पूरी राशि भवन के सुधार कार्य (जैसे टाइल वर्क, वायरिंग, पुताई आदि) पर खर्च हो चुकी है। करीब दो साल बाद, एक शिकायत के आधार पर विभाग ने याचिकाकर्ता को शामिल किए बिना उनकी पीठ पीछे कार्य का दोबारा मूल्यांकन करवाया। इस नई रिपोर्ट में दावा किया गया कि मौके पर केवल 1,39,110 का ही काम हुआ है और बाकी बचे 1,10,890 याचिकाकर्ता से वसूलने के आदेश जारी कर दिए गए। अदालत ने पाया कि असिस्टेंट इंजीनियर (सहायक अभियंता) की ओर से जारी उपयोगिता प्रमाण पत्र, तहसीलदार की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट और सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट, ये सभी दस्तावेज यह साबित करते हैं कि वास्तव में भवन की मरम्मत पर 2,50,000 की पूरी राशि खर्च की गई थी। विभाग ने अपनी प्रतिक्रिया में भी इन आधिकारिक दस्तावेजों की प्रामाणिकता को नहीं नकारा।

 
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फैसला-4

चिंतपूर्णी मंदिर परिसर विस्तार मामले में हाईकोर्ट की सरकार को कड़ी चेतावनी
प्रदेश हाईकोर्ट ने चिंतपूर्णी मंदिर परिसर के विस्तार, सौंदर्यीकरण और पार्किंग व्यवस्था से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार पर सख्त रुख दिखाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि तय समय के भीतर जरूरी कदम नहीं उठाए गए, तो अदालत जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के लिए मजबूर होगी। डिप्टी कमिश्नर ऊना की ओर से अदालत में हलफनामा दायर किया गया। बताया गया कि मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर भारी वाहनों की पार्किंग के लिए सरकारी जमीन की पहचान की गई है।इस जमीन को चिंतपूर्णी मंदिर ट्रस्ट के नाम ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जमीन ट्रांसफर होते ही निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा। स्थानीय दुकानदारों के साथ बातचीत चल रही है। इस जमीन का उपयोग मंदिर परिसर का विस्तार और सौंदर्यीकरण, श्रद्धालुओं के लिए विश्राम गृह, साफ पीने का पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के लिए किया जाएगा। याचिकाकर्ता ने कहा कि कई महीने बीत जाने के बाद भी धरातल पर कोई खास प्रगति या सुधार नहीं देखा गया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को अंतिम चेतावनी देते हुए नोटिस पर रखा है कि अगर अगली बार तक काम पूरा नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों को अदालत की अवमानना और उसके गंभीर कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ेगा। इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं और पर अब अगली सुनवाई 21 अगस्त को होगी।
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