गोहर (मंडी)। तीन माह से बारिश न होने के कारण उपमंडल गोहर में सूखे का संकट छा गया है। गंदम की बिजाई का समय निकल गया है। जिससे हजारों किसानों के चेहरे मुरझा गए हैं। किसान आसमान की ओर नजर लगाए हुए हैं। कृषि विशेषज्ञों की मानें तो 15 नवंबर तक गंदम की बिजाई का अंतिम समय होता है। मगर वह भी अब सूखे के साथ साथ निकल गया है। पानी का जल स्तर भी नीचे चला गया है। जिससे लोग खेतों को सिंचाई करने से भी महरूम होगए हैं।
घरों में किसानों ने गंदम का बीज बिजाई के लिए तैयार रखा है। मगर इंद्र देवता की ओर से अभी किसानों को बिजाई का कोई संकेत नहीं मिल रहा है। किसानों ने अपने खेतों में मटर, टमाटर और अन्य नगदी फसलों को साफ कर दिया है। किसान अब गंदम और आलू की बिजाई को लेकर पूरी तैयारी में है। कृषि विभाग के गोहर स्थित विषयवाद विशेषज्ञ डा. खूबराम चौहान ने बताया कि गोहर ब्लॉक में 4 हजार हेक्टेयर भू भाग में हर वर्ष गंदम की बिजाई की जाती है।
कृषि विभाग ने गोहर ब्लॉक के अंतर्गत अपने सभी 8 सेल सेंटरों में गंदम का 8 सौ क्विंटल बीज उपलब्ध करवा दिया है। 15 नवंबर तक गंदम की बिजाई का समय होता है तथा उचित समय से एक सप्ताह बाद भी किसान गंदम की बिजाई कर सकते हैं। मगर सवाल यह उठता है कि बिजाई के निर्धारित समय के बाद अगर बारिश नहीं होती है
तो किसान बिजाई कैसे कर पाएंगे।
कृषि विभाग गोहर ब्लाक के अंतर्गत चैलचौक, गोहर, बासा, तरौर, मौवीसेरी, बैला, स्यांज, छपराहण, चच्योट, नौण, शाला, तुना, धंगयारा, जहल, कांढी कमरूनाग, देवीदहड़, सकीबांई, किलिंग, झूंगी, ब्राहोकडी समेत आसपास की पंचायतों में किसान बिना बारिश के गंदम के लिए खेत तक तैयार नहीं कर पाए हैं। किसानों को इंतजार है तो बस बूंदाबांदी का। किसानों में चंद्रमणी ठाकुर, भोला राम, दीवान चंद, दीनानाथ, भीम सिंह, योगेश कुमार, परमा राम, भूप सिंह, परस राम, विजय कुमार, दुनी चंद, रमेश कुमार, प्रेम सिंह ठाकुर और गुलाब सिंह ने बताया कि उन्होंने गंदम के बीज की खरीद कर ली है तथा बारिश होने पर किसान गंदम की बिजाई करेंगे। बहरहाल मौसम का अगर यही रुख रहा तो किसान बड़ा देव कमरूनाग की शरण में जा सकते हैं। इस बार पूरा अक्तूबर माह बिना बारिश के ही गुजर गया। नवंबर में किसानों को बारिश की आस थी मगर आधा महीना बीत गया मगर बारिश नहीं हुई है। अब किसानों की दिक्कतें और बढ़ गई हैं। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में ज्यादातर किसान बारिश पर ही निर्भर रहते हैं। यहां सिंचाई के साधन पर्याप्त नहीं हैं।