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Mandi News: महाशिवरात्रि में अहम है माता नैणा देवी का स्थान

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मंडी। जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर स्थित तीन धर्मों (हिंदू, सिख और बौद्ध) की स्थली रिवालसर विश्व विख्यात है। इतिहासकारों के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह कुछ समय यहां रुके थे। यहां लोमश ऋषि ने भी तपस्या की थी। रिवालसर से 13 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत सरकीधार के गदवाहण गांव में माता नैणा देवी का मंदिर है, जिन्हें श्रद्धालु अपनी कुलदेवी के रूप में मानते हैं। दस महाविधाओं से संपन्न माता नैणा उग्रतारा का मंडी महाशिवरात्रि में अहम स्थान है। लोक मान्यताओं और बुजुर्गों से सुनी गाथाओं के अनुसार सरकीधार में रियासतकाल से ही माता का मंदिर था जो 1905 में आए भूकंप से ढह गया था। बाद में मंडी रियासत के राजा अजबर सेन ने इसे दोबारा बनवाया था।
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मंदिर के सेवादार यशपाल शर्मा ने बताया कि माता के जेठा गूर भागीरथ वशिष्ठ ने करीब 80 वर्ष पूर्व 12 वर्षों तक सरकीधार में तपस्या की। माता ने उन्हें दृष्टांत देकर सोने का मोहरा (मुखौटा) तैयार करवाने के आदेश दिए। गदवाहण गांव में पहले प्राकृतिक जल स्रोत था, जिसका पानी जूठा होने पर वह लुप्त हो गया। आज भी गदवाहण गांव में माता का मूल स्थान है और सरकीधार की पहाड़ी पर भव्य मंदिर बना है। माता के आदेश पर वहां खुदाई करने पर जमीन से राख और चिमटे मिले थे। पूछताछ करने पर यहां गोरख नाथ और भैरव नाथ के ठहरने के प्रत्यक्ष प्रमाण मिले थे।
मान्यता अनुसार माता की कृपा से मंडी रियासत के राजा अजबर सेन की खराब आंखें ठीक होने पर उन्होंने यहां मंदिर निर्माण करवाया और माता को नैणा उग्र तारा नाम दिया था। रियासतकाल से ही माता महाशिवरात्रि मेला में शिरकत करती हैं और बाबा भूतनाथ मंदिर में ठहराव करती हैं। संवाद
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