मंडी। वरिष्ठ सिविल जज मंडी की अदालत ने 35 साल पुरानी वसीयत को वैध ठहराते हुए देशराज व अन्य का संपत्ति संबंधी वाद आंशिक रूप से डिक्री कर दिया है।
मामले के अनुसार, पारस राम ने 17 जनवरी 1992 को अपने भाई मस्तराम के पक्ष में वसीयत की थी, जो 28 जनवरी 1992 को पंजीकृत हुई थी। वादी पक्ष ने संपत्ति को पैतृक बताते हुए वसीयत को फर्जी व संदेहास्पद करार दिया था और उत्तराधिकार की मांग की थी।
अदालत ने गवाहों और दस्तावेजों के आधार पर पाया कि पारस राम और पलास राम एक ही व्यक्ति थे और वसीयत नियमानुसार निष्पादित हुई थी। वसीयत के गवाह तुलसी राम व तत्कालीन नायब तहसीलदार बहादुर सिंह की गवाही को महत्वपूर्ण माना गया।
हालांकि, राजस्व रिकॉर्ड में खसरा नंबर-5 (रकबा 0-15 बिस्वा) पैतृक सहदायिक संपत्ति पाई गई। इसलिए इस भूमि में पारस राम का हिस्सा ही वसीयत के तहत मस्तराम को मिलेगा और शेष हिस्से में वादी तथा मस्तराम सह-स्वामी रहेंगे। बाकी संपत्ति पर मस्तराम को वसीयत के आधार पर पूर्ण मालिक माना गया।