जिला भर में मकर संक्रांति का पर्व धूमधाम से मनाया गया। सराज घाटी में अलग ही परंपरा के अनुसार मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस दिन तड़के पक्षी की आवाज सुनने से पहले ही जल स्रोतों में स्नान करने की परंपरा है। मकर संक्रांति पर प्राकृतिक स्रोतों में स्नान करना पवित्र माना जाता है।
सराज घाटी में मकर सक्रांति को नए वर्ष की शुरूआत के रूप में भी मनाया जाता है और नया वर्ष कैसा होगा इसके लिए विशेष तौर पर यहां पर उगने वाले पेड़ पाजो की टहनियां तोड़कर उन्हें चूल्हे के अंगारों के बीच डाला जाता है। अगर टहनियों के पत्ते से जोर की आवाज करते हैं तो ऐसा माना जाता कि इस वर्ष फसल अच्छी रहेगी।
मकर सक्रांति पर लोग अलग-अलग समूहों में बंट कर चिड़िया रथ घुमाते हैं। मकर संक्रांति पर्व को मनाने के लिए लोग एक माह से देसी घी का प्रबंध करते हैं तथा मकर सक्रांति के दिन खिड़की के साथ खाते हैं। जिला के मंडी, सरकाघाट, धर्मपुर, नेरचौक, गोहर, चैलचौक, सुंदरनगर, जोगिंद्रनगर, चौंतड़ा क्षेत्र में हर घर में खिचड़ी बनाई गई। चौंतड़ा व आस पास के क्षेत्रों में मकर संक्रांति धूमधाम से मनाई गई।
लोहड़ी पर्व के उपलक्ष पर क्षेत्र में लोगों ने बुधवार रात्रि को पारंपरिक व्यजनों तिल चोली, नमकीन व मीठे बबरु, पकोडू, भल्ले व अन्य खाद्य पदार्थों का जायका लिया। नौनिहालों ने प्राचीन समय से चली आ रही घर-घर जाकर लुकड़ियां गाने व लोहड़ी मांगने के कार्यक्रमों को आयोजित कर लोहड़ी के पर्व के महत्व को ओर बढ़ा दिया। इसके साथ घरों में लकड़ी जलाकर पारंपरिक गीतों से पूजा अर्चना की। इसके साथ-साथ वीरवार को खिचड़ी का देशी घी व खोरु, झोल के साथ खाकर पर्व आनंद परिवारजनों व सगे संबंधियों के साथ लुत्फ लिया।