करसोग (मंडी)। कभी स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य उद्घोष रहा चरखा और हथकरघा उद्योग अब भारत से विलुप्त हो चुका है। 1905 में बंगाल विभाजन से स्वदेशी, स्वराज्य और बहिष्कार का उद्घोष विस्फोटित होने से चरखा हर घर की पहचान बन गया। सुकेत की राजधानी रही पांगणा में 20वीं सदी में स्वदेशी कपड़ा बुनने के लिए अनेक खड्डियां लगाई गईं। लोग खड्डियों पर बुने कपड़ों को पहनकर राष्ट्रीयता का अनुभव कर गौरवान्वित अनुभव करते थे।
पांगणा के नगराओं निवासी 67 वर्षीय लक्ष्मण पांच दशक से पुश्तैनी हथकरघा खड्डी पर आज भी शॉल, मफलर और कोट की पट्टियां बनाकर राष्ट्रीय संघर्ष के प्रतीक हथकरघा उद्योग की परंपरा जीवित रखे हुए हैं। लक्ष्मण के अनुसार उन्होंने बुशहर से अपने नाना और किन्नौर से विवाहित नानी से खड्डी पर कपड़े बुनने के हुनर को सीखा था।
मशीनीकरण के इस युग में खड्डी पर शॉल, पट्टी और मफलर को बुनने से आर्थिक लाभ की संभावना कम रहती है। लक्ष्मण के अनुसार खड्डी पर कपड़ा बुनने से मुश्किल से तीन 300 रुपये की दिहाड़ी अर्जित होती है। ऐसे में नई पीढ़ी के लोग इस पारंपरिक कार्य को सीखने के प्रति उदासीनता दिखाते हैं। उन्होंने इस उद्योग को जीवित रखने के लिए प्रोत्साहन देने की मांग की है। संवाद