पड़ैई अनुष्ठान के साथ प्रकृति, देव और पितृ परंपरा का अनूठा संगम
संवाद न्यूज एजेंसी
करसोग (मंडी)। सुकेत, मंडी, सराज और कुल्लू क्षेत्रों में बैसाख संक्रांति के अवसर पर पारंपरिक बीरशु पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। इसे नववर्ष की पहली संक्रांति के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है, जिसमें लोक परंपराएं और वैदिक अनुष्ठान एक साथ देखने को मिलते हैं।
इस अवसर पर घर-घर में मांदला पूजन और ‘पाची लगाने’ की परंपरा निभाई गई। आंगन में गेरू से मांदला बनाकर गोबर से गणेश स्थापना की गई और बुरांस के फूलों से पूजन किया गया। घी से बनी लूचियां, पटांडे और हलवा जैसे नैवेद्य अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की गई।
इसके बाद घर की छत के मुख्य शहतीर की पूजा कर गोबर से बने गणेश को सजाया गया और आटे-गुड़ से बने प्रतीकात्मक बकरे की पूजा के माध्यम से गृह सुरक्षा का संकल्प लिया गया। प्रकृति से जुड़ी ‘पड़ैई’ पूजा में देवदार की शाखा को पूजित कर परंपरा निभाई गई।
सुकेत की प्राचीन राजधानी पांगणा में लाहौल मेले के दौरान शिव-पार्वती विवाह की झांकी और देव परंपराओं का प्रदर्शन किया गया। इस पूरे आयोजन को क्षेत्र की सांस्कृतिक जीवंतता और लोक आस्था का प्रतीक माना जाता है, जो सुकेत, मंडी, सराज और कुल्लू की समृद्ध परंपराओं को दर्शाता है।