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श्रद्धालु कमरूनाग झील में अर्पित करेंगे सोना, चांदी और नकदी

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- फोटो : अमर उजाला
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गोहर (मंडी)। बड़ादेव कमरूनाग के सरानाहुली मेले में अजब प्रथा है। लोग पावन झील में मन्नत पूरी करने के लिए सोने, चांदी और नकदी डालते हैं। यह रीत सदियों से चली आ रही है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए जनपद के अधिष्ठाता बड़ा देव कमरूनाग का ऐतिहासिक सरानाहुली मेला 14 से लेकर 15 जून तक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इसके लिए देवता कमेटी और कांढी कमरूनाग पंचायत ने सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। प्रशासन की ओर से मेले में सुरक्षा व्यवस्था कायम रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस का प्रबंध कर दिया गया है। इसमें प्रदेश और बाहरी प्रदेशों से करीब 1 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। मेले से पूर्व भी देव कमरूनाग के दर्शनों के लिए भक्तों और सैलानियों का आवागमन जारी है। काढी कमरूनाग पंचायत के प्रधान मान सिंह ठाकुर ने बताया कि सरानाहुली मेले को लेकर हारयानों और देव समाज में खुशी की लहर है। कमरूनाग मेेले के लिए सरोआ, रोहांडा, मंडोगलू, धंग्यारा और पांगणा आदि रास्तों से लोग कमरूनाग पहुंच रहे हैं। देवता के गूर लीलमणी ने बताया कि देव कमरूनाग मेला इस वर्ष भी धूमधाम से मनाया जाएगा। एसएचओ गोहर मनोज वालिया ने बताया कि कमरूनाग में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए वीरवार को मेला स्थल पर पुलिसकर्मी तैनात कर दिए जाएंगे। अशांति फैलाने वालों से पुलिस सख्ती से निपटेगी। अपने मेले में कमरूनाग देवता का सूरजपखा नहीं जाता जबकि मंडी के अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि मेले में देव कमरूनाग का सूरजपखा जाता है।
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ऐसे मनाया जाता है सरानाहुली मेला
कमरूनाग के सरानाहुली मेले में देवता की पवित्र झील की श्रद्धालु परिक्रमा करते हैं। मन्नत पूरी होने पर देवता के भक्त पवित्र झील में सोना, चांदी, नकदी और सिक्के चढ़ाते हैं। इस पवित्र झील में स्नान करना वर्जित है। लेकिन, तीन वर्ष बाद जब झील की सफाई होती है तो देवता के हारयान देवता की आज्ञा से झील में उतरते हैं और इसकी सफाई करते हैं।

सैकड़ों बच्चों के होते हैं मुंडन संस्कार
देव कमरूनाग के सरानाहुली मेले में सैकड़ों बच्चों के मुंडन संस्कार होते हैं। इस दौरान पशु बलि की परंपरा रहती थी। मगर कोर्ट ने पशु बलि पर प्रतिबंध लगाकर इस परंपरा को बंद कर दिया है। अब बच्चों के मुंडन संस्कार के दौरान पशु बलि नहीं होती है।
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