हथकरघा खोल रहा है स्वरोजगार की राह, कुल्लू में हो रहा 21 करोड़ का सालाना कारोबार
जिले में 197 सहकार प्राथमिक समितियां कर रही है 7.85 करोड़ रुपये का कारोबार
गौरीशंकर
कुल्लू। हथकरघा सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि आजीविका और आत्मनिर्भरता की मजबूत डोर बन चुका है। कुल्लू में यह परंपरागत उद्योग आधुनिक रोजगार का जरिया बनकर उभरा है।
एक ओर गांव-गांव में महिलाएं खड्डी पर पट्टू बुनकर अपनी पहचान गढ़ रही हैं, वहीं बुनकर समितियां और सहकारी संस्थाएं हर साल करोड़ों का कारोबार कर हजारों लोगों को परोक्ष रूप से रोजगार दे रही हैं। करीब 21 करोड़ के सालाना कारोबार के साथ कुल्लू का हथकरघा क्षेत्र न केवल आर्थिक विकास की कहानी कह रहा है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत बनाए हुए है। इससे 8 हजार से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं खड्डी पर पट्टू बुनकर अच्छी कमाई कर रही हैं। अधिकारिक रूप से जिले में 197 प्राथमिक बुनकर समितियां हैं। इनके 5752 सदस्य हैं। ये समितियां सालाना 7.85 करोड़ का कारोबार कर रही हैं।
बुनकर के क्षेत्र में भुट्टी को-ऑपरेटिव सोसायटी का कारोबार करोड़ों में हैं। सोसायटी का कारोबार सालाना 13.32 करोड़ हैं। सोसायटी के भुट्टी कालोनी स्थित उद्योग में 130 से अधिक कर्मचारी और बुनकर कार्यरत हैं। 1000 लोगों को सोसायटी ने रोजगार दिया है।
खड्डी की बुनाई से आत्मनिर्भर बनीं महिलाएं
जिले का कोई ऐसा गांव नहीं है जहां घरों में खड्डी न हो। महिलाएं दैनिक कार्य निपटाने के बाद आज भी खड्डी पर बैठकर पट्टू की बुनाई का काम करती हैं। इससे उन्हें अच्छी खासी आय मिल रही है और महिलाएं इससे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही है। गौरतलब है कि एक पट्टू की कीमत 5000 से 25000 रुपये तक होती है।
जिले में बुनकर समितियां अच्छा कार्य कर रही हैं। यह लोगों को रोजगार के अवसर भी दे रही हैं। इससे लोग आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं। जिले में 197 प्राथमिक बुनकर समितियों का कारोबार सालाना 7.85 करोड़ से अधिक हो रहा है। - आशा शर्मा, सहायक पंजीयक सहकारिता विभाग