कुल्लू, ट्रैकिंग, ट्रैकर्स, छात्र
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मणिकर्ण घाटी के कसोल-रशोल-मलाणा ट्रैकिंग रूट पर फंसे नेपाल के पांच छात्रों को ढूंढना किसी चुनौती से कम नहीं रहा। 14 लोगों की तीन रेस्क्यू टीमों ने इस ऑपरेशन को भूखे प्यासे अंजाम दिया। पहले से बिछी तीन फुट बर्फ के साथ रेस्क्यू टीम के लिए ताजा बर्फबारी व भारी बारिश एक चुनौती रही। तेज आंधी-तूफान भी ऑपरेशन में रोड़ा बना। बावजूद रेस्क्यू टीम ने भूखे-प्यासे ही ऑपरेशन को बखूबी अंजाम दिया। रेस्कयू टीम में मेडिकल टीम नहीं होने से दो छात्रों की जान न बच सकी। रेस्कयू टीम के पास कोई खास उपकरण भी नहीं थे। जिनके सहारे लापता छात्रों को ढूंढा जा सके, लेकिन हौसले से टीम ने रात-दिन जंगल छानते हुए छात्रों को ढूंढ निकाला। करीब 23 घंटों तक चले इस ऑपरेशन में मलाणा के लिए ट्रैकिंग पर गए छात्रों को ढूंढने में साढ़े 18 घंटे का समय लगा।
वहीं रशोल टॉप से करीब 100 मीटर नीचे फंसे मिले पांचों छात्रों को रेस्क्यू करने में ढाई घंटे का समय लगा। टीम को घायल हुए सभी पांचों छात्रों को बर्फ के बीच सात किलोमीटर की उतराई में पीठ पा उठाकर पहुंचाने पड़े। लापता छात्रों को ढूंढने के लिए एक टीम मलाणा, दूसरी रशोल तथा तीसरी टीम को नेरंग की ओर निकली। रातभर बर्फबारी, बारिश व आंधी-तूफान के बीच सर्च ऑपरेशन चलता रहा। जो सुबह चार से पांच बजे तक चला। इसके बाद टीम ने मलाणा गांव में एक घंटे रेस्ट किया और फिर से अभियान शुरू हुआ। कड़ी मशक्कत के बाद रेस्क्यू टीम को बर्फ में पांव के निशान मिले और इसी को ट्रेस करते हुए टीम आगे बढ़ी और फंसे छात्रों तक पहुंची। दिल्ली में सीए और आईटी की पढ़ाई करने वाले पांचों छात्र दो अप्रैल को दिल्ली से बस द्वारा मणिकर्ण पहुंचे। यहां ठहरने के बाद तीन अप्रैल को वह खीर गंगा गए और रात्रि ठहराव भी यहीं किया। चार अप्रैल सुबह वह वापस कसोल आए और रात्रि ठहराव के बाद पांच अप्रैल को वह मलाणा के लिए रवाना हुए। छह अप्रैल को उनका दिल्ली वापस लौटने का कार्यक्रम था।