कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में सदियों से चली आ रही देव परंपराओं का निर्वहन किया जा रहा है। वहीं मंगलवार शाम को ऐसी ही एक परंपरा को अधिष्ठाता देवता रघुनाथ और माता त्रिपुरा सुंदरी के कारकूनों और हारियानों ने श्रद्धा के साथ निभाया।
भगवान राम ने लंका दहन (लंका पर चढ़ाई) की पूर्व रात्रि को माता त्रिपुरा सुंदरी के तीन रूपों की पूजा-अर्चना की और माता से आशीर्वाद लिया। भगवान राम ने माता को महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में पूजा। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में माता त्रिपुरा सुंदरी का विशेष महत्व है। दशहरे के साथ माता का इतिहास भी जुड़ा है। भगवान राम लंका दहन से पहले माता की पूजा कर शक्ति अर्जित करते हैं। कुल्लू में इस परंपरा का वर्तमान में भी निर्वहन किया जाता है।
वही इस बार भी दशहरा में मौहल्ला के दिन मंगलवार को इस पौराणिक परंपरा को निभाया गया। भगवान रघुनाथ के मंदिर सुल्तानपुर (राजघराने) में शाम 08:00 बजे के बाद माता के पुजारी का माता के रूप में श्रृंगार किया गया। इसके उपरांत माता रूपी पुजारी को भगवान रघुनाथ के ढालपुर स्थित अस्थायी शिविर में लाया गया। वहीं, माता के अस्थायी शिविर में एक व्यक्ति को शेर का रूप दिया गया। शेर को भी श्रृंगार के बाद भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में लाया गया। इसके बाद माता रूपी पुजारी शेर पर सवार रहता है। उसकी रात 10:00 बजे के करीब विशेष पूजा-अर्चना की गई। यह विशेष पूजा-अर्चना लंका दहन से पहले की जाती है। माता के पुजारी मोनू ने कहा कि माता का नाम विद्या राज राजेश्वरी है, जिसे स्थानीय भाषा में बड़ी देवी कहा जाता है। माता की विशेष पूजा-अर्चना करने के उपरांत ही लंका दहन की परंपरा को निभाया जाता है। माता कि ये पूजा-अर्चना लंका दहन की पूर्व रात्रि को होती है और माता राज परिवार की मुख्य कुल देवी है। इस बार परंपरा को निभाने के लिए उनके छोटे भाई विक्की ने माता का रूप धारण किया।
मंदिरों में अलग-अलग रूप में विराजमान
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में माता त्रिपुरा सुंदरी का जिला आयुष अस्पताल के पास माता हिडिंबा के साथ ही अस्थायी शिविर है। इसमें माता श्रद्धालुओं को दर्शन दे रहीं हैं। हालांकि, ऊझी घाटी के शाड़ी शौह में माता का मुख्य मंदिर है। इसी क्षेत्र में माता के तीन मंदिर शाड़ी सौह, मशाड़ा व बनैण में हैं। इन सभी मंदिरों में माता अपने अलग-अलग रूपों महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में विराजमान हैं।