दशहरा उत्सव के समापन के बाद देव-मिलन कर देवालय लौटते देवता।-संवाद
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के लिए ढालपुर मैदान में सात दिनों तक विराजमान रहे देवी-देवताओं की विदाई मंगलवार सुबह से शुरू हो गई। सुबह छह से सात बजे के बीच देवी-देवताओं ने ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच अपने देवालयों की ओर प्रस्थान करना शुरू कर दिया। सबसे पहले दुर्गम क्षेत्र निरमंड के कुईकंडा नाग सहित बाह्य सराज के अन्य देवी-देवता रवाना हुए।
देवी-देवताओं के प्रस्थान करते ही उनके अस्थायी शिविरों को समेटने का काम भी शुरू हो गया। तिरपाल, बिस्तर और भोजन तैयार करने के सामान को गाड़ियों में लादकर भेजा गया, जबकि देवलू अपने आराध्य के साथ पैदल यात्रा पर निकल पड़े। सुबह करीब दस बजे तक बाह्य सराज, निरमंड और आनी क्षेत्र के अधिकतर देवी-देवता रवाना हो चुके थे।
जिन देवी-देवताओं की रथयात्रा में भूमिका नहीं होती, वे उत्सव के अंतिम दिन सुबह से ही अपने देवालयों की ओर लौटना शुरू कर देते हैं। रथयात्रा में शामिल होने वाले देवी-देवता इसके बाद रवाना होते हैं। मंगलवार को रथयात्रा शुरू होने से पहले ही करीब 30 फीसदी देवी-देवता ढालपुर से विदा हो चुके थे। रथयात्रा संपन्न होने के बाद शाम सात बजे तक अन्य देवी-देवताओं की वापसी का सिलसिला जारी रहा। शाम ढलने तक करीब 80 फीसदी देवी-देवता अपने देवालयों की ओर प्रस्थान कर चुके थे।
दूरदराज के क्षेत्रों से आए देवलू राम दास, निक्का राम और संगत राम ने बताया कि दशहरा उत्सव में करीब 70 से 80 देवी-देवता रथयात्रा में भाग लेते हैं। जिन देवी-देवताओं की इसमें भूमिका नहीं होती, वे सुबह से ही अपने देवालयों की ओर लौटने लगते हैं।
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कुछ देवी देवता ढालपुर में ही विराजमान
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में 315 से अधिक देवी-देवता पहुंचे हैं। इसमें से 12 से 15 देवी-देवता ऐसे हैं जो आखिरी दिन भी अपने देवालय का रुख नहीं करते हैं और अगले दिन यानी बुधवार को रवाना होंगे।
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