पुश्तैनी मोहरे, नरसिंगा और करनाल को स्मृति चिह्नों में ढाला, अब बढ़ा रहे होटलों की शान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी स्मृति चिह्न दे चुकी है सरकार
मोहरे, नरसिंगा का स्मृति चिह्न कुल्लवी बाॅर्डर लगाकर तैयार कर रहे हैं कुल्लू के वेदराम
गौरीशंकर
कुल्लू। आधुनिकता की दौड़ में जब पारंपरिक शिल्प दम तोड़ रहे थे, तब कुल्लू के वेद राम ने अपनी विरासत को नया कलेवर देकर न सिर्फ उसे जीवित रखा, बल्कि उसे देश-दुनिया तक पहुंचाया।
पुश्तैनी मोहरे, नरसिंगा और करनाल को उन्होंने स्मृति चिह्नों में ढालकर उसे कला और संस्कृति का प्रतीक बना दिया। आज उनके बनाए शिल्प प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक को भेंट किए जा चुके हैं। इस नवाचार से न केवल संस्कृति सजीव हुई, बल्कि 60 से अधिक लोगों को रोजगार भी मिला।
ये स्मृति चिह्न आलीशान घरों, होटलों और रेस्टोरेंट के साथ सरकारी कार्यालयों की शोभा बन रहे हैं। उनके बनाए स्मृति चिह्न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी प्रदेश सरकार की ओर से भेंट किए जा चुके हैं। प्रदेश में होने वाले बड़े आयोजनों में आने वाली हर शख्सियत को इस तरह के स्मृति चिह्न देने की रिवायत भी शुरू हो गई है। वेद राम ने पुराने संस्कृति में नयापन लाकर इस क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं के लिए भी रोजगार की राह दिखाई है।
क्या कहते हैं वेद राम
युवा वेद राम ने कहा कि वह मंडी जिले के थाची से ताल्लुक रखते हैं। वर्तमान में कुल्लू के शीशामाटी में रह रहे हैं। हमारे पूर्वज पहले देवी-देवताओं के मोहरे बनाने का काम करते थे। वर्तमान में यह काम काफी कम हो गया है। इसमें नयापन लाना जरूरी था। नरसिंगा, करनाल, मोहरे, ओम, स्वास्तिक आदि बनाकर इसे स्मृति चिह्न का रूप दिया। लोग घरों, होटलों, रेस्टोरेंट की दीवारों में लगाने के लिए इनकी खरीदारी करते हैं।
3500 रुपये से शुरू होती है एक स्मृति चिह्न की कीमत
ये स्मृति चिह्न हिमाचल में लगने वाले मेले और प्रदर्शनियों के अलावा चेन्नई, हरियाणा के हिसार सहित कई राज्यों में प्रदर्शनियों में सज चुके हैं। इनमें ये आकर्षण का केंद्र रहे। दिल्ली में इनकी अच्छी-खासी खरीदारी हुई। दो दिन में बनने वाले एक स्मृति चिह्न की कीमत 3500 रुपये से शुरू होती है।
वेदराम ने 60 और लोगों को अपने साथ जोड़ा
मोहरे, नरसिंगे, करनाल को स्मृति चिह्न के रूप में बनाने के साथ बड़ी करनाल, नरसिंगा, धड़च, कांसे की घंटियां, प्रशनें बनाने का भी काम कर रहे हैं। वेद राम ने कहा कि वह यह सारा कार्य निर्वाण हैंडीक्राफ्ट के माध्यम से कर रहे हैं। अपने साथ 60 से अधिक लोगों को जोड़ा है।