कुल्लू। देवभूमि कुल्लू में अनूठी देव परंपराओं का निर्वहन सदियों से किया जा रहा है। ऐसी ही एक परंपरा लगघाटी के आराध्य देवता कतरूसी नारायण के काहिका उत्सव में निभाई गई। भल्याणी गांव में हुए इस काहिका उत्सव में देवीय शक्ति के साक्षात्कार हुआ। काहिका उत्सव में आए सैकड़ों लोग देव शक्ति के साक्षी बने। काहिका उत्सव में नड़ मरकर जिंदा हुआ। काहिका उत्सव में भुट्टी के देवता क्षेत्रपाल, पतरिंग के देवता ब्रम्हा, बड़ाग्रां के देवता गौहरी ने भी हाजिरी भरी।
जबकि काहिका उत्सव की अगुवाई भल्याणी के देवता मुख्य देवता कतरूसी नारायण ने की। इससे पहले देवताओं की हुल्की हुई। हुल्की में देवलुओं ने एक दूसरे पर आटा फेंका। हुल्की की धुन पर देवता के साथ देवलु भी झूमे। शाम छह बजे के बाद काहिका में नड़ को मारने की प्रक्रिया शुरू हुई। देव कारकून के द्वारा तीर आसमां की ओर छोड़ते ही नड़ मूर्च्छित हो गया। इसके बाद नड़ को साथ लेकर देवलुओं और देवताओं ने मंदिर की परिक्रमा की। तीसरी परिक्रमा पूरी करने के बाद ढोल, नगाड़ों, नरसिंगों की ध्वनियों के बीच देव शक्ति के प्रभाव से नड़ जीवित हो उठा। जिसके बाद देवताओं की जय जयकार से पूरा गांव गूंज उठा। घाटीवासी खुशहाल सिंह, रमेश कुमार, नवल, बाला राम ठाकुर, मोहन लाल ठाकुर और नेसू राम ने कहा कि काहिका उत्सव भल्याणी में धूमधाम से मनाया गया।
मान्यता है कि अगर काहिका में नड़ जीवित नहीं होता है तो देवता के रथ की सारी संपत्ति पर नड़ की पत्नी का अधिकार हो जाता है। हालांकि भल्याणी काहिका में देवताओं ने अपनी शक्ति का परिचय दिया। कतरूसी नारायण के कारदार रूम सिंह नेगी ने कहा कि देवता के आदेशानुसार काहिका उत्सव भल्याणी गांव में देव परंपरा के अनुसार मनाया गया। काहिका उत्सव में देवताओं ने अपनी शक्तियों का साक्षात्कार करते हुए नड़ को जिंदा किया। उन्होंने कहा कि काहिका में लगघाटी के अन्य देवता भी लाव लश्कर के साथ शामिल हुए।