अमर उजाला ब्यूरो
लारजी (कुल्लू)। मौसम चक्र में आए परिवर्तन से कुल्लू जिला के ऊपरी क्षेत्र के ग्रामीणों के चेहरों पर रौनक आ गई है। जिला में कई वर्षों के बाद इस बार जंगलों में गुच्छी की बंपर पैदावार हुई है। अप्रैल और मई माह में प्राकृतिक तौर पर उगने वाली गुच्छी कुल्लू जिला के ऊपरी क्षेत्र के ग्रामीणों की आर्थिकी की रीढ़ मानी जाती है। यह बहुत महंगी होती है।
अब मशरूम प्रजाति की यह बूटी घर-आंगन के आसपास भी मिलने लगी है। विशेषज्ञों की मानें तो यह जलवायु में आए परिवर्तन का नतीजा है। अकेले कुल्लू जिला में हर वर्ष करोड़ों रुपये की गुच्छी का कारोबार होता है। इस बार गुच्छी का बंपर पैदावार होने से ग्रामीण खुश हैं। बीते पांच वर्षों में कम पैदावार होने से पर्यावरण विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया था। अमूमन गुच्छी मार्च से नवंबर माह तक जंगलों में दो चरणों में मिलती है। इस वर्ष फरवरी माह में ही ग्रामीणों को मिलने लगी है। सैंज घाटी के शांघड़, शैंशर, सुचैहण, धाउगी, गोही और कनौन पंचायत के कई ग्रामीणों ने बताया कि बागीचों में काम करते हुए उन्हें गुच्छी मिलने से हैरानी हुई। ग्रामीण रोशन लाल, गुरदेव, ओम प्रकाश, यान सिंह और प्रेम चंद ने बताया कि मार्च-मई माह में वह गुच्छियों की तलाश में जंगलों में जाते हैं। लेकिन इस बार उन्हें फरवरी माह में अपने बागीचों में ही गुच्छियां मिल रही हैं। कमला देवी, सोम लता, आशा और रोशनी देवी ने कहा कि ग्रामीण महिलाएं अप्रैल माह से टोलियों में गुच्छी की तलाश में जंगलों में जाती हैं। इस बार बंपर उत्पादन शुरू होने से महिलाएं उत्साहित है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद आशीष प्रभात ने कहा कि जंगलों से की जा रही छेड़छाड़ से कई प्रजाति के पक्षी और पौधे विलुप्त हो रहे हैं। इस छेड़छाड़ से प्राकृतिक रूप से उगने वाली गुच्छी की पैदावार भी असंतुलित हुई है।
खेतों तक पहुंच गई गुच्छी
ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के निदेशक अजीत ठाकुर ने कहा कि यह जलवायु में आए परिवर्तन का नतीजा है। गुच्छी उत्पादन समय के साथ-साथ उत्पादन क्षेत्र भी बदल रहा है। पहले यह बूटी घने जंगलों में पाई जाती थी। अब खेतों तक पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर गहनता से शोध किया जा रहा है।
गुच्छी की सप्लाई जाती है बाहर
प्राकृतिक तौर पर उगने वाली गुच्छी की मांग दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बंगलूरू में सबसे अधिक रहती है। यहां के पांच सितारा होटलों में गुच्छी को सब्जी के रूप में परोसा जाता है। इसके अलावा इसका प्रयोग दवा में भी किया जाता है। यह बहुत औषधीय होती है।