कुल्लू दशहरा उत्सव के दौरान परिक्रमा पर निकले देवता।-संवाद
खराहल (कुल्लू)। देवी-देवताओं के ढालपुर में आयोजित हो रहे देव महाकुंभ यानी कुल्लू दशहरा में जिलेभर से 300 से अधिक देवी-देवता अपने अस्थायी शिविरों में विराजमान हो गए हैं। अब सात दिन तक ढालपुर में लगाए गए अस्थायी शिविरों में ही देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होगी। देवी-देवताओं के देवालय आजकल सूने पड़ गए हैं। इन दिनों मंदिरों में कोई धार्मिक अनुष्ठान या अन्य कारज नहीं हो सकेंगे।
ऐतिहासिक देव समागम में सभी देवी-देवता की अपनी-अपनी भूमिका रहती है। मनाली से आईं माता हिडिंबा के बिना दशहरा उत्सव नहीं हो सकता है। इसका आगाज और समापन देवी हिडिंबा ही करती हैं। वहीं, बिजली महादेव की उपस्थिति भी बेहद अनिवार्य होती है। नग्गर की त्रिपुरा सुंदरी, माता दोचा मोचा करजां का किरदार भी देव समागम में अहम रहता है। बंजार, सैंज, निरमंड सहित आनी के देवताओं की हाजिरी भी रघुनाथ के समक्ष अत्यंत गौरवमय मानी जाती है। एक साल के बाद रघुनाथ के साथ भव्य मिलन का मनमोहक दृश्य सबके मन को भाता है। हर रोज सैकड़ों ढोल-नगाड़ों, करनाल, नरसिंगों, घंटी और शहनाई की मंगल ध्वनि से कुल्लू का आसमान गुंजायमान हो रहा है। कुल्लू देव महाकुंभ को देखने के लिए हजारों की तादाद में लोग पहुंच रहे हैं। देश और विदेश के पर्यटक और शोधकर्ता भी कुल्लू पहुंचे हैं। आध्यात्मिकता से सराबोर इस नजारे को अपने कैमरों में कैद कर रहे हैं। एक साल के लंबे समय के बाद ढालपुर में देवी-देवताओं का मिलन हो रहा है। देवी-देवताओं के देवलु भी कड़े नियम से बंधे हुए हैं। लंका दहन के बाद ही देवी-देवताओं के मंदिरों में रौनक लौटेगी। जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम बताते हैं कि दशहरा समापन के बाद ही अब देवालय में रौनक और देव अनुष्ठान तथा अन्य देव कारज हो पाएंगे। उन्होंने कहा कि दशहरा में 12 से 15 दिन तक देवता अपने देवालय से बाहर रहते हैं।