ग्रामीणों ने ये कहा
ग्रामीण इंद्र सिंह, बाजूराम, विजय सिंह, शुपाराम, भीम सिंह, कल्याण सिंह और गुलाब सिंह के अनुसार उनके लिए पुश्तैनी जमीन महज जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की पहचान और विरासत है। इसी मिट्टी में उनके पूर्वजों ने जीवन बिताया, परिवार बसाए और आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन छोड़ी। जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजीं, उसी आंगन में बुजुर्गों की यादें भी जुड़ी हैं। अब चिंता यह है कि झील बनने के बाद आने वाली पीढ़ियां शायद उस घर, खेत और गांव को सिर्फ तस्वीरों और बुजुर्गों की बातों में ही जान पाएंगी।
सात राजस्व व 14 उपगांव प्रभावित होने की जानकारी
परियोजना से हिमाचल के सात राजस्व गांव और 14 उपगांव प्रभावित होने की जानकारी है। शिलाई क्षेत्र के मोहराड़, मश्वाड़, कुसेनु, डूडोग, चाकरी, नेरा, सियासु, मिनस, जिलूर, सांग और जामली सहित कई गांव-उपगांव प्रभावित होने की बात सामने आई है। उत्तराखंड के शम्भर-मेलोथ, मझगांव, कोटा, बोहग, सेंज, पाटन, मिनस और रामढूंगा सहित अन्य क्षेत्र भी प्रस्तावित जलाशय की जद में आएंगे। भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के प्रावधानों के तहत प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास की सुविधा मिलेगी, लेकिन ग्रामीणों के सामने सवाल केवल जमीन की कीमत का नहीं है। सवाल उस मातृभूमि का है, जिसे पैसे के बदले दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता।
मकान फिर बन जाएगा, वह आंगन कहां से आएगा?
इन गांवों के लिए डूबने का अर्थ केवल मकानों का पानी में समा जाना नहीं है। इसके साथ खेत-खलिहान, पुराने रास्ते, स्कूल, मंदिर, पूजा स्थल और सामाजिक जीवन से जुड़ी अनगिनत यादें भी पीछे छूट जाएंगी। जिस खेत ने दशकों तक परिवारों का पेट पाला, वह खेत नहीं रहेगा। जिस पगडंडी पर चलते हुए बच्चे स्कूल पहुंचे, वह रास्ता नहीं रहेगा। जिस चौपाल में गांव के बुजुर्ग बैठकर फैसले करते थे, उसकी जगह भी पानी ले सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजा जमीन की कीमत चुका सकता है, लेकिन यादों की कीमत नहीं। नई जगह पर घर बनाया जा सकता है, लेकिन वह पुराना आंगन नहीं बनाया जा सकता जहां पीढ़ियों ने बचपन बिताया। नई जमीन खरीदी जा सकती है, लेकिन पूर्वजों की मिट्टी नहीं।
देवस्थलों और आस्था के डूबने की भी चिंता
प्रभावित क्षेत्रों में वर्षों पुराने देवस्थल और पूजा स्थल स्थानीय आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपराएं इन्हीं स्थानों से जुड़ी हैं। जलाशय बनने की स्थिति में इन स्थलों के भी प्रभावित होने की आशंका है। ग्रामीणों के लिए यह केवल भवनों के डूबने का मामला नहीं, बल्कि उनकी आस्था और सांस्कृतिक विरासत के प्रभावित होने का भी सवाल है।
किशाऊ नाम को लेकर विरोध के स्वर
किशाऊ बांध परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर लिए गए हैं, लेकिन जौनसार-बावर क्षेत्र में परियोजना के नाम को लेकर भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं। किशाऊ बांध संघर्ष समिति की बैठक में संरक्षक मुन्ना सिंह राणा और अध्यक्ष मातवर सिंह तोमर की अध्यक्षता में परियोजना के नामकरण पर आपत्ति जताई जा चुकी है। समिति का कहना है कि किशाऊ गांव प्रस्तावित बांध स्थल से करीब 15 किलोमीटर दूर है और परियोजना में किशाऊ गांव की एक इंच जमीन भी नहीं आ रही है। समिति के अनुसार प्रस्तावित बांध चकराता तहसील के शम्भर-मेलोथ क्षेत्र में है। ऐसे में समिति ने परियोजना का नाम क्षेत्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने की मांग की है।
पुनर्वास और मुआवजे को लेकर चर्चा तेज
पुनर्वास सिर्फ घर तक सीमित न होपरियोजना के आगे बढ़ने के साथ प्रभावित परिवारों के बीच पुनर्वास और मुआवजे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। ग्रामीणों की चिंता है कि पुनर्वास केवल नया मकान उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी आजीविका, कृषि भूमि, सामाजिक रिश्तों, धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक पहचान को भी ध्यान में रखना होगा। कई परिवारों के लिए पुश्तैनी जमीन उनकी रोजी-रोटी का आधार होने के साथ-साथ सामाजिक पहचान भी है। ऐसे में विस्थापन के बाद नई जगह पर बसना केवल घर बदलना नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली बदलने जैसा होगा।
दशकों पुरानी परियोजना, अब सामने आया विस्थापन का सच
बताया जाता है कि 1940 के दशक में इस क्षेत्र में बांध निर्माण की प्रारंभिक वैज्ञानिक जांच शुरू हुई थी। पहाड़ों की मजबूती और भूगर्भीय स्थिति परखने के लिए भूमिगत परीक्षण सुरंगों और गहरी ड्रिलिंग तक की गई थी। बताया जाता है कि 1960 के दशक में सामने आई वैज्ञानिक रिपोर्टों में मूल किशाऊ स्थल को बांध निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया। इसके बाद प्रस्तावित स्थल को शम्भर-मेलोथ और चामड़ा-मोहराड़ क्षेत्र की ओर स्थानांतरित किया गया। इसके बाद दशकों तक तकनीकी और भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण होते रहे, लेकिन परियोजना का नाम किशाऊ ही बना रहा।
विकास की कीमत में कहीं मिट न जाए गांव की पहचान
ग्रामीण विकास और ऊर्जा की जरूरतों से इनकार नहीं करते, लेकिन उनका कहना है कि परियोजना की सामाजिक कीमत को भी गंभीरता से समझना होगा। प्रभावित परिवारों को मुआवजे और पुनर्वास के साथ उनकी आजीविका, सामाजिक ताना-बाना, देवस्थलों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की ठोस व्यवस्था मिलनी चाहिए।