पालमपुर (कांगड़ा)। प्रकृति के सफाई प्रहरी कहे जाने वाले गिद्ध न केवल पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं, बल्कि रेबीज और प्लेग जैसी घातक महामारियों को रोकने में भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने गिद्धों के इसी पारिस्थितिक और जनस्वास्थ्य संबंधी महत्व पर प्रकाश डाला।
उन्होंने चेतावनी दी कि गिद्धों के अस्तित्व पर मंडराता खतरा सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकता है। कार्यशाला में संरक्षण जीवविज्ञानी क्रिस बाउडेन और डॉ. पर्सी अवारी ने बताया कि गिद्ध मृत पशुओं के अवशेषों को शीघ्रता से समाप्त कर देते हैं। यदि ऐसा न हो तो सड़ते हुए अवशेषों से रेबीज, तपेदिक (टीबी) और प्लेग जैसी जूनोटिक बीमारियां फैलने का डर बना रहता है।
विशेषज्ञों ने कांगड़ा जिले को गिद्धों की स्वस्थ आबादी के लिए एक सुरक्षित केंद्र बताया और यहां उपलब्ध प्राकृतिक आहार स्थलों के संरक्षण पर बल दिया। तकनीकी सत्र में सामने आया कि पशुओं के उपचार में उपयोग होने वाली कुछ दवाएं (जैसे डाइक्लोफेनाक और निमेसुलाइड) गिद्धों के लिए घातक साबित हो रही हैं।
विशेषज्ञों ने पशु चिकित्सकों से आग्रह किया कि वे केवल गिद्ध-सुरक्षित विकल्पों को ही अपनाएं। कुलपति डॉ. अशोक कुमार पांडा ने कहा कि प्रकृति के इस स्वच्छता प्रहरी को बचाने के लिए वैज्ञानिक समुदाय और आम जनता का समन्वित प्रयास आवश्यक है।