धर्मशाला। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी-प्रथम धर्मशाला सोनल शर्मा की अदालत ने धर्मशाला स्थित एक राष्ट्रीयकृत बैंक की तीन अलग-अलग शिकायतों पर धर्मशाला पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) के तहत पारित आदेशों में कहा कि शिकायतों में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध दर्शाते हैं। इनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
पहले मामले में बैंक ने आरोप लगाया कि धर्मशाला क्षेत्र के व्यक्ति ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत स्टील फर्नीचर एवं फैब्रिकेशन यूनिट स्थापित करने के लिए ऋण लिया गया लेकिन निरीक्षण के दौरान मौके पर कोई यूनिट अथवा मशीनरी नहीं मिली।
दूसरे मामले में बैंक ने आरोप लगाया कि वाहन ऋण लेने वाले ने कथित रूप से फर्जी अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) के आधार पर वाहन से बैंक की हाइपोथिकेशन हटवा दी। बैंक का कहना है कि आरोपी ने ऋण नकद जमा करने का दावा किया, जबकि बैंक अभिलेखों में ऐसी कोई प्रविष्टि नहीं है।
वहीं, तीसरे मामले में बैंक ने आरोप लगाया कि आवास निर्माण के लिए 20 लाख रुपये का ऋण चार किस्तों में जारी किया गया लेकिन ऋण लेने वाले ने न तो मकान का निर्माण कराया और न ही राशि का उपयोग स्वीकृत उद्देश्य के लिए किया।
अदालत ने कहा कि यह केवल ऋण अदायगी में चूक का मामला नहीं है बल्कि यदि राशि का जानबूझकर दुरुपयोग किया गया है तो यह आपराधिक जांच का विषय बनता है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल इस आधार पर कि बैंक के पास ऋण वसूली के लिए दीवानी उपाय उपलब्ध हैं, संभावित आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं हो जाता।
न्यायालय ने यह भी पाया कि पुलिस की प्रारंभिक जांच में शिकायतों के मुख्य आरोपों की समुचित जांच नहीं की गई। इन्हीं परिस्थितियों में अदालत ने तीनों मामलों में धर्मशाला पुलिस थाना को शिकायतों के आधार पर एफआईआर दर्ज कर कानून के अनुसार जांच करने के निर्देश दिए हैं।