धर्मशाला। टीचर वेलफेयर एसोसिएशन ऑफ मेडिकल कॉलेज कांगड़ा, टांडा (टेमकॉट) ने नेरचौक मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरों के सामूहिक तबादलों के हालिया सरकारी फैसले की आलोचना की है। संघ ने कहा कि इस फैसले ने प्रदेशभर की मेडिकल बिरादरी को गहरी चिंता में डाल दिया है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि सरकार अन्य मेडिकल कॉलेजों में भी इसी तरह के बड़े पैमाने पर तबादलों की योजना बना रही है, जो स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल शिक्षा के ढांचे पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
एसोसिएशन का कहना है कि हिमाचल के मेडिकल कॉलेज पहले ही सीमित संसाधनों, कम स्टाफ और एनएमसी (नेशनल मेडिकल कमीशन) के सख्त मानदंडों को पूरा करने में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में फैकल्टी और मेडिकल ऑफिसर्स के अचानक बड़े पैमाने पर तबादले न केवल अव्यवस्था का कारण बनेंगे, बल्कि मेडिकल शिक्षा, मरीजों की देखभाल और स्पेशियलिटी सेवाओं के दीर्घकालिक विकास पर भी गहरा असर डालेंगे। संघ ने कहा कि फैकल्टी की संख्या में कमी से कॉलेज एनएमसी के आवश्यक फैकल्टी-स्टूडेंट अनुपात को पूरा नहीं कर पाएंगे, जिसका परिणाम यह हो सकता है कि यूजी और पीजी कोर्सेज की मान्यता रद्द या निलंबित हो जाए, जैसा कि पहले टांडा मेडिकल कॉलेज के एनेस्थीसिया विभाग में हो चुका है। फैकल्टी की कमी का सबसे बड़ा असर छात्रों पर पड़ेगा। उनकी डिग्री, परीक्षाएं, क्लीनिकल ट्रेनिंग और भविष्य की संभावनाएं असुरक्षित हो सकती हैं। संघ ने कहा कि भले ही सरकार इसे नियमित तबादला नीति का हिस्सा मानती हो, लेकिन इस तरह के निर्णय वास्तविकता को नजरअंदाज करते हुए किए जा रहे हैं और यह अव्यवहारिक हैं।
संगठन ने सरकार से अपील की है कि वह इस निर्णय पर पुनर्विचार करे और सभी स्टेकहोल्डर्स से संवाद कर इस मुद्दे का समाधान निकाले। एसोसिएशन की मांग है कि पहले सभी नियमित पदों पर नियुक्तियां की जाएं, फिर असिस्टेंट प्रोफेसरों और मेडिकल ऑफिसर्स के तबादलों पर विचार किया जाए।