हिमाचल प्रदेश में रबी फसलों की बिजाई का समय नजदीक आते ही किसानों के लिए कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर ने जरूरी सलाह जारी की है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अक्तूबर के पहले पखवाड़े में किसानों को मौसम और क्षेत्र के अनुसार गेहूं, चना, मटर सहित विभिन्न फसलों की बिजाई और सब्जियों की रोपाई करने का सुझाव दिया है। ऊंचे क्षेत्रों में गेहूं की बिजाई शुरू करें।
कृषि विश्वविद्यालय के अनुसार प्रदेश के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं की अगेती किस्मों की बिजाई अक्तूबर के पहले पखवाड़े में शुरू की जा सकती है। इसके लिए एचएस-542, एचपीडब्ल्यू-360 और वीएल-829 जैसी किस्मों की सिफारिश की गई है। विश्वविद्यालय ने किसानों को सलाह दी है कि गेहूं की बिजाई से पहले बीज का उपचार जरूर करें। इसके लिए बेविस्टिन, वीटावेक्स या रैक्सिल से बीज उपचार करने की सलाह दी गई है। इससे बीज और शुरुआती फसल को रोगों से बचाने में मदद मिल सकती है।
चने की बिजाई के लिए मध्य अक्तूबर बेहतर
किसानों के लिए चने की फसल को लेकर भी कृषि विश्वविद्यालय ने महत्वपूर्ण सलाह दी है। मध्य अक्तूबर को चने की बिजाई के लिए सबसे उपयुक्त समय बताया गया है। चने की खेती के लिए हिमाचल चना-1, हिमाचल चना-2, जीपीएफ-2 और एचपीजी-17 अनुमोदित किस्मों की सिफारिश की गई है। चने की फसल को उखेड़ा यानी विल्ट रोग से बचाने के लिए बीज को बेविस्टिन और थीरम से उपचारित करने की सलाह दी गई है। किसानों को चने की बिजाई करीब 10 से 12.5 सेंटीमीटर की गहराई पर करने को कहा गया है।
निचले क्षेत्रों में राया की खेती का विकल्प
प्रदेश के निचले क्षेत्रों के किसानों के लिए राया की खेती को लेकर भी सलाह दी गई है। यहां आरसीसी-4 और करण राई जैसी अनुमोदित किस्मों की खेती की जा सकती है। राया को शुद्ध फसल के रूप में बोने के साथ-साथ गेहूं के साथ मिश्रित खेती के रूप में भी लगाया जा सकता है।
मटर और सब्जियों की बिजाई का भी सही समय
कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. जनार्दन सिंह के अनुसार निचले क्षेत्रों में इस समय मटर की अगेती किस्मों की बिजाई की जा सकती है। इनमें पालम त्रिलोकी, अरकल, वीएल-7 और मटर अगेता शामिल हैं। इसके अलावा किसानों के लिए पालक, मेथी, धनिया, मूली, गाजर, शलजम और लहसुन की बिजाई के लिए भी यह समय अनुकूल बताया गया है। वहीं, मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में किसान फूलगोभी, बंदगोभी, गांठगोभी और ब्रॉकली की पौध रोप सकते हैं। विश्वविद्यालय ने यह भी सलाह दी है कि गुड़ाई के दौरान पौधों की जड़ों के पास नाइट्रोजन की मात्रा दी जाए, ताकि फसल की बढ़वार बेहतर हो सके।
पौध तैयार करने से पहले मिट्टी का करें शोधन
गोभी वर्गीय फसलों की स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए क्यारियों की मिट्टी का पहले से शोधन करने की सलाह दी गई है। विश्वविद्यालय के अनुसार पौध की बिजाई से करीब 20 दिन पहले क्यारियों को फॉर्मेलिन और पानी के घोल से शोधित किया जा सकता है। वहीं, कटुआ कीट से बचाव के लिए पौधों के पास क्लोरपाइरिफॉस 20 ईसी के घोल से सिंचाई करने की सलाह दी गई है।
तिलहनी फसलों में एफिड से बचाव
तिलहनी फसलों में तेला यानी एफिड जैसे कीटों के नियंत्रण पर भी किसानों को ध्यान देने को कहा गया है। कृषि विश्वविद्यालय ने इसके लिए साइपरमेथ्रिन, मिथाइल डेमेटॉन या डाइमिथोएट के घोल के छिड़काव की सलाह दी है।
किसानों के लिए जरूरी है कि किसी भी कीटनाशक या रसायन का इस्तेमाल लेबल पर दिए निर्देश, अनुशंसित मात्रा और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही करें। कृषि विश्वविद्यालय की यह सलाह ऐसे समय आई है जब प्रदेश में किसान खरीफ फसलों के बाद रबी सीजन की तैयारियों में जुट रहे हैं। सही समय पर बिजाई, उपयुक्त किस्म का चयन और बीज उपचार से फसल की शुरुआती अवस्था को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।