धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने डीएसपी बैजनाथ के तबादला आदेश के संचालन पर स्टे लगा दिया है। अदालत ने 24 दिसंबर 2024 की अधिसूचना जारी होने से पहले की स्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं। इस मामले में सरकार और अन्य से 22 मार्च 2025 तक जवाब मांगा गया है। याचिकाकर्ता एचपीएस अधिकारी अनिल कुमार को प्रदेश सरकार ने मई 2024 में बैजनाथ में उप पुलिस अधीक्षक (एसडीपीओ) के रूप में तैनात किया था। हिमाचल प्रदेश पुलिस अधिनियम 2007 की धारा 12 के अंतर्गत आमतौर पर एसडीपीओ का एक स्थान पर कार्यकाल दो वर्ष का होता है और यदि एसडीपीओ को सक्षम प्राधिकारी की ओर से न्यूनतम दो वर्ष की समाप्ति से पहले हटा दिया जाता है, तो संबंधित अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कारणों को लिखित रूप में दर्ज किया जाना अनिवार्य होता है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि संबंधित अधिकारी के तबादले के दौरान इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। अधिवक्ता ने बताया कि एसडीपीओ को कानून में निर्धारित अपना सामान्य कार्यकाल पूरा करने की अनुमति दी गई है और स्थानांतरण आदेश केवल निजी प्रतिवादी को समायोजित करने के लिए पारित किया गया है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता के वकील को सुनने के बाद और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता को संबंधित अधिनियम की धारा 12 में निर्धारित कार्यकाल पूरा करने की अनुमति दिए बिना स्थानांतरित किया गया है, इस पर न्यायालय ने याचिकाकर्ता के स्थानांतरण आदेश के संचालन पर रोक लगा दी है। सरकार और विभाग को निर्देश दिया गया है कि वे 24 दिसंबर 2024 की अधिसूचना जारी होने से पहले की यथास्थिति बनाए रखें। साथ ही याचिकाकर्ता को बैजनाथ में सेवा जारी रखने की अनुमति दी जाए और निजी प्रतिवादी को उसी स्टेशन पर सेवा जारी रखने का निर्देश दिया जाए, जहां वह विवादित स्थानांतरण आदेश जारी होने से पहले था।
सत्ता पक्ष और विपक्ष की ओर से हुई थी बयानबाजी
डीएसपी बैजनाथ के तबादले को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष की ओर से खूब बयानबाजी हुई थी। विपक्ष ने आरोप लगाया गया था कि मई 2024 में बैजनाथ में उप पुलिस अधीक्षक के पद पर ज्वाइन करने वाले डीएसपी अनिल कुमार शर्मा ने नियमों की अवहेलना करने वालों पर कानून के तहत सख्त कार्रवाई की थी। इसके बाद सत्तापक्ष के इशारे पर डीएसपी का छह माह में ही तबादला कर दिया गया। विपक्ष के बयान पर सत्तापक्ष की ओर से भी जवाब दिया गया और कहा कि सत्ता पक्ष के किसी भी व्यक्ति का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं।