वजीर राम सिंह मेमोरियल स्कूल पर लटका ताला
नौ अप्रैल को नूरपुर स्कूल बस हादसे के बाद से अस्थायी रूप से बंद था स्कूल
117 छात्रों को स्कूल प्रबंधन ने जारी किए सर्टिफिकेट
अमर उजाला ब्यूरो
नूरपुर (कांगड़ा)। चेली गांव में स्कूल बस हादसे के बाद सुर्खियों में आए वजीर राम सिंह पठानिया मेमोरियल हाई स्कूल गुरचाल को दो मई को प्रशासन के निर्देश पर अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था, उस स्कूल को प्रबंधन ने अब स्थायी रूप से बंद कर दिया है। हालांकि नौ अप्रैल को स्कूल बस हादसे के बाद से ही स्कूल बंद चल रहा था, लेकिन बच्चों की पढ़ाई को मद्देनजर रखते हुए कुछ अभिभावकों के दबाव के चलते दो मई को दोबारा स्कूल खोलने को लेकर मृतक बच्चों के परिजनों के विरोध के बाद प्रशासन ने शांति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इसे बंद करवा दिया था।
बस हादसे से पहले स्कूल में कुल 154 बच्चों ने विभिन्न कक्षाओं में दाखिला लिया था। इनमें से स्कूल प्रबंधन ने पहली कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा के 117 बच्चों को स्कूल ट्रांसफर सर्टिफिकेट (एसटीसी) जारी कर दिए हैं। चूंकि स्कूल में नर्सरी से यूकेजी क्लासों में दाखिला लेने वाले 37 अन्य छात्रों ने दाखिला लिया था, उन्हें अन्य स्कूलों में प्रवेश लेने के लिए एसटीसी की आवश्यकता नहीं है। स्कूल के अध्यक्ष दलजीत सिंह ने बताया कि प्रशासन ने स्कूल प्रबंधन को दो मई को कुछ समय के लिए स्कूल को बंद रखने के निर्देश दिए थे, लेकिन स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों की पढ़ाई करीब एक माह बीतने के बाद भी सुचारु न होने के चलते प्रबंधन ने संस्थान को स्थायी रूप से बंद करने का फैसला लिया और सभी छात्रों को एसटीसी जारी कर दिए गए हैं। उधर, खंड प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी पुरुषोत्तम शर्मा ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि स्कूल प्रबंधन ने सभी छात्रों को एसटीसी जारी कर दिए हैं। इनमें पहली से पांचवीं कक्षा के 33 छात्रों, छठी से आठवीं कक्षा के 24 और नौवीं से दसवीं कक्षा तक के 60 छात्रों को एसटीसी जारी किए गए हैं। इस संदर्भ में एसडीएम नूरपुर आबिद हुसैन सादिक ने बताया कि एसटीसी जारी होने के बाद सभी छात्रों की ओर से निजी और आसपास के क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों में दाखिला लिया जा रहा है और अब ये सभी छात्र अपनी पढ़ाई को सुचारु कर सकेंगे। अभिभावकों की मानें तो ठेहड़, गुरचाल, खुआड़ा, मलकवाल और सदवां में सरकारी स्कूल हैं, लेकिन इन स्कूलों में बुनियादी ढांचे और स्टाफ की कमी के चलते मजबूरन निजी स्कूलों का रुख करना पड़ता है।