पालमपुर (कांगड़ा)। प्रदेश में किसानों की आय दोगुनी करने और उनके स्वास्थ्य को तरोताजा रखने के लिए प्रदेश में शन्यू लागत खेती की जोरों की कवायद शुरु कर दी गई है। किसानों के हित और लोगों की सेहत को बेहतर रखने वाली शून्य लागत खेती में किसानों का खर्च तो कम होगा ही। लेकिन, साथ ही इस खेती से लोगों के शरीर पर रसानियक खेती के पढ़ रहे दुष्प्रभावों को भी कम किया जा सकता है। हालांकि, अभी तक किसानों की सोच और खेत से बाहर इस खेती को आने और किसानों का कितना कायापलट होता है। यह बाद की बात है।
लेकिन, कृषि वैज्ञानिकों की ओर से प्रदेश सरकार की ओर से शुरू की गई शून्य लागत बजट योजना को प्रदेश में जोरशोर से शुरू किया जा रहा है। राज्यपाल आचार्य देवव्रत के आह्वान पर शुरू की गई शून्य लागत खेती पर प्रदेश सरकार अब कृषि विभाग के सहयोग से किसानों के खेत तक इसे ले जाने की तैयारी में है। शून्य लागत खेती के एक्सपर्ट महाराष्ट्र के पद्मश्री सुभाष पालेकर की मानें, तो रसायनिक खेती में अधिक लागत आने के साथ मानव, पशुओं और पर्यावरण के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। रसायनिक खेती से शुरू में उत्पादन भले ही बढ़ता है।
लेकिन, कुछ सालों बाद उत्पादन में गिरावट आने लगती है, जबकि प्राकृतिक खेती में उत्पादन लगातार बढ़ता है। फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है, खेती की लागत कम होती है। प्राकृतिक खेती की यह पद्धति दिन प्रतिदिन लोकप्रिय हो रही है। यह गर्व की बात है कि इसे हिमाचल में बढ़ावा दिया जा रहा है। देश में किसान जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उन सबका निदान प्राकृतिक कृषि में ही निहित है। रसायनिक खेती के दुष्प्रभावों को प्राकृतिक खेती से ही कम किया जा सकता है।