अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं की मौजूदगी के बीच देव परंपराओं का निर्वहन करने वाले कारकूनों की जीवनशैली भी अनूठी है। उत्सव के सात दिन तक देवताओं के मुख्य कारकून तपस्वियों की तरह रहते हैं। देव नियमों में बंधे इन कारकूनों को अपने आराध्य के अस्थायी शिविर में रहकर चाकरी करनी पड़ती है। उनके खानपान से लेकर रहने तक के नियम निर्धारित होते हैं। वे शिविर में बना भोजन ही खाते हैं और परंपरा के अनुसार बाहर होटल-ढाबों में चाय-पानी तक से परहेज करते हैं।
कुल्लू दशहरा में देवताओं के मुख्य कारकूनों के लिए सात दिन तक नियमों का पालन करना बड़ी जिम्मेदारी होती है। उन्हें रहने और खाने-पीने से जुड़ी कई बंदिशों के बीच अपने देवता की सेवा करनी पड़ती है। यह व्यवस्था देव परंपराओं के प्रति उनकी आस्था, अनुशासन और समर्पण को दर्शाती है। - दोत राम ठाकुर, अध्यक्ष जिला देवी-देवता कारदार संघ