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क्षेत्रीय पार्टियों पर भरोसा नहीं करते हिमाचली

Mon, 10 Mar 2014 12:08 PM IST
प्रेम प्रताप सिंह/अमर उजाला, शिमला
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हिमाचल की राजनीति का मिजाज थोड़ा हटकर है। अन्य राज्यों में जहां क्षेत्रीय पार्टियां केंद्र की राजनीति में तेजी से उभर रही हैं, वहीं हिमाचल की जनता ने बड़ी पार्टियों पर ही भरोसा जताया है।
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लोकसभा चुनाव में यहां छोटे दलों का दखल न के बराबर रहा है। 1999 को छोड़ दिया जाए, तो लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियां यहां खाता नहीं खोल पाई हैं।

1999 में शिमला से हिविकां (हिमाचल विकास कांग्रेस) के टिकट पर कर्नल धनीराम शांडिल चुनाव जीते थे। इसके अलावा बीते तीन दशकों से हिमाचल में भाजपा और कांग्रेस का ही दबदबा रहा है।

इस दौरान लोकसभा चुनावों में छोटे दल इतने वोट भी नहीं ले पाए कि परिणाम प्रभावित हो सके। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार 1980 के लोकसभा चुनाव में कांगड़ा से जनता पार्टी को 7.82, मंडी से 4.25, शिमला से 10.57 प्रतिशत मत मिले थे।
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दूसरे नंबर के प्रत्याशियों के मतों में यदि ये वोट भी जोड़ दिए जाते तो भी परिणाम पर कोई असर नहीं होता। 1980 में प्रदेश की चारों सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया। 1984 में शिमला से एलकेडी को 4.76, कांगड़ा से सीपीआई को 3.47, मंडी से जनता पार्टी को 0.7 प्रतिशत मत पड़े। इस बार फिर कांग्रेस ने चारों सीटें झोली में डालीं।

1989 में कांगड़ा में जनता पार्टी को 14.77 एवं शिमला में 14.36, मंडी में सीपीएम को 2.09, जनता पार्टी को 0.74, हमीरपुर से सीपीआई को 4.95 और जनता पार्टी को 0.2 फीसदी वोट मिले। तब पहली बार हिमाचल में भाजपा ने तीन सीटों पर कब्जा किया।

कांग्रेस को एक सीट से ही संतोष करना पड़ा। इसके बाद 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 तक लोस चुनाव में छोटे दलों का कोई वजूद नहीं रहा। हालांकि, 1991 में कांगड़ा से जनता दल के प्रत्याशी को सबसे अधिक 17.85 फीसदी वोट मिले।
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