उन्होंने बताया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित सीटों को किसी अन्य वर्ग में समायोजित नहीं किया जा सकता। बावजूद इसके केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमालय प्रदेश ने इस नियम की अवहेलना करते हुए सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थी को अनुचित रूप से लाभ पहुंचाया। हिमाचल प्रदेश दिव्यांगजन राज्य आयुक्त शिमला की अदालत में इस नियुक्ति को लेकर सीयू प्रशासन को सख्त आदेश भी जारी हो चुके हैं। डॉ. विजेंद्र शर्मा, विधि विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाबदेही तय करने और भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग भी की।
डॉ. विजेंद्र शर्मा ने कहा कि जब विश्वविद्यालय प्रशासन से इस विषय पर प्रतिक्रिया मांगी गई, तो उन्होंने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। केवल यह कहा गया कि मामले की जांच की जा रही है। राष्ट्रीय मंच दिव्यांगजन के अधिकार और कर्तव्य समेत अन्य दिव्यांग अधिकार संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि शीघ्र ही इस मामले का समाधान नहीं हुआ, तो वे उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेंगे और दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक आंदोलन छेड़ेंगे। यह मामला भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में दिव्यांगजनों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि संबंधित अधिकारियों द्वारा त्वरित और न्यायसंगत कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला कानूनी लड़ाई और सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।
उधर, इस बारे में केंद्रीय विवि के कुलसचिव नरेंद्र सांख्यान ने कहा कि उन्होंने हाल ही में विवि में ज्वाइन किया है। अगर दिव्यांग कोटे के पद को सामान्य श्रेणी से भरा गया है तो इस संदर्भ में विवि की ओर से सभी जरूरी औपचारिकताओं को पूरा किया होगा। लेकिन फिर भी मामले की जांच के बाद इस बारे पूरी जानकारी दी जाएगी।